H1B और L1 वीज़ा पर पाबंदी: अप्रवासियों के ख़िलाफ़ ट्रंप का बड़ा क़दम

इस बात की पूरी संभावना है कि भारत, अमेरिका के इस क़दम की अनदेखी करने की कोशिश करेगा. क्योंकि, ट्रंप ने अप्रवासियों को लेकर ये क़दम उस संवेदनशील मौक़े पर उठाया है, जब भारत और चीन के बीच ज़बरदस्त तनातनी चल रही है.

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति चुनाव के प्रचार में बेहद उठा-पटक के दौर से गुज़र रहे हैं. लगभग हर सर्वे में वो अपने प्रतिद्वंदी, डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रत्याशी जो बाइडेन से पीछे चल रहे हैं. बाइडेन की इस बढ़त से पार पाने के लिए ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश पर दस्तख़त करके H1B और L1 वीज़ा के ज़रिए अमेरिका आने वालों के रास्ते बंद कर दिए. इसके अलावा ट्रंप ने कामकाज के अन्य अस्थायी परमिट जारी करने पर भी रोक लगा दी. यही नहीं, प्रेसीडेंट ट्रंप ने कुछ ग्रीन कार्ड पर पाबंदी को भी बढ़ा दिया है. अप्रवासियों को अमेरिका में प्रवेश करने से रोकने के लिए ट्रंप ने जो ये क़दम उठाए हैं. ख़ास अमेरिकी वीज़ा पर ये पाबंदियां इस साल के अंत तक लागू रहेंगी. और ट्रंप सरकार को ये उम्मीद है कि इससे अमेरिका की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को संभालने में मदद मिलेगी, जो कोविड-19 के प्रकोप की वजह से बेहद बुरी स्थिति में है. ट्रंप ने तर्क दिया कि, ‘ये हमारी नैतिक ज़िम्मेदारी है कि हम ऐसी अप्रवासी व्यवस्था का निर्माण करें, जो हमारे देश के नागरिकों और उनकी नौकरियों की हिफ़ाज़त कर सके.’ ट्रंप प्रशासन को ये उम्मीद है कि राष्ट्रपति के इस क़दम से अमेरिकी नागरिकों के लिए रोज़गार के नए अवसर निकलेंगे.

कोविड-19 के चलते जैसे जैसे अमेरिकी अर्थव्यवस्था की हालत बिगड़ती गई, वैसे वैसे राष्ट्रपति ट्रंप के लिए अप्रवासियों को वीज़ा पर रोक लगाने की मजबूरी बढ़ती गई.

काफ़ी समय से ये अंदाज़ा लगाया जा रहा था कि ट्रंप प्रशासन वीज़ा को लेकर ये क़दम उठा सकता है. कोविड-19 के चलते जैसे जैसे अमेरिकी अर्थव्यवस्था की हालत बिगड़ती गई, वैसे वैसे राष्ट्रपति ट्रंप के लिए अप्रवासियों को वीज़ा पर रोक लगाने की मजबूरी बढ़ती गई. क्योंकि ये चुनावी साल है और ट्रंप के लिए ये चुनाव जीतना बड़ी चुनौती बना हुआ है. अमेरिका की अर्थव्यवस्था अभी भी लॉकडाउन के क़हर से उबरने की कोशिश कर रही है. बेरोज़गारी की दर सबसे ऊंचे स्तर पर है. सरकार की ओर से अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए और स्टिमुलस की मांग पिछले कुछ दिनों में और तेज़ हो गई है. क्योंकि, कई प्रामाणिक रिपोर्ट में ये इशारा किया जा रहा है कि इस साल अमेरिकी अर्थव्यवस्था 6.5 प्रतिशत तक घट सकती है. हालांकि, इस साल मार्च से अर्थव्यवस्था में थोड़ा सुधार देखा जा रहा है. फिर भी, अमेरिका में बेरोज़गारी की दर 1940 के दशक के बाद से सबसे अधिक बनी हुई है.

राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा अप्रवासियों को वीज़ा देने पर रोक लगाने से उनके समर्थकों का दायरा, नवंबर में होने वाले चुनाव से पहले बढ़ सकता है. लेकिन, अमेरिका के बहुत से कारोबारी समूह इसके ख़िलाफ़ लॉबीइंग कर रहे थे. क्योंकि, इस क़दम से अमेरिका की अर्थव्यवस्था को और नुक़सान होने की ही आशंका है. और इससे अर्थव्यवस्था में जो थोड़ा बहुत सुधार आ भी रहा है, उसके कमज़ोर हो जाने का भी डर है. अमेरिका का तकनीकी उद्योग ख़ासतौर से अप्रवासी वीज़ा पर रोक लगाने का विरोध कर रहा है. तकनीकी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि इससे उनके क्षेत्र में इनोवेशन की रफ़्तार धीमी पड़ जाएगी. और ये ठीक उस वक़्त होगा, जब इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है. ऐसा आकलन किया जा रहा है कि ट्रंप प्रशासन के इस क़दम से इस साल कम से कम दो लाख 19 हज़ार विदेशी कामगारों के अमेरिका आने पर रोक लग जाएगी.

अमेरिका का तकनीकी उद्योग ख़ासतौर से अप्रवासी वीज़ा पर रोक लगाने का विरोध कर रहा है. तकनीकी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि इससे उनके क्षेत्र में इनोवेशन की रफ़्तार धीमी पड़ जाएगी. और ये ठीक उस वक़्त होगा, जब इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है.

अप्रवासियों को वीज़ा की इस नीति में निकट भविष्य में कोई बदलाव आने की उम्मीद नहीं है. क्योंकि, कोरोना वायरस और यात्रा पर पाबंदियों के चलते वीज़ा जारी करने की प्रक्रिया पहले से ही रुकी हुई है. फिर भी, हमें राष्ट्रपति ट्रंप के इस क़दम को केवल आर्थिक नज़रिए से नहीं देखना चाहिए. ट्रंप का ये फ़ैसला विशुद्ध रूप से राजनीतिक है. क्योंकि, 2016 के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान ट्रंप ने अमेरिका की जनता से ये वादा किया था कि वो अमेरिका आने वाले अप्रवासियों की बाढ़ को रोकेंगे. और अब जबकि चुनावी साल है और वो अपने प्रतिद्वंदी से पिछड़ रहे हैं, तो ज़ाहिर है उन्हें अपना चुनावी वादा पूरा करने के लिए ये क़दम उठाना ही था. डोनाल्ड ट्रंप के कट्टर समर्थकों के लिए आज भी अप्रवासियों का मसला बहुत बड़ा मुद्दा है. दोबारा राष्ट्रपति बनने की ट्रंप की मुहिम के दौरान भी अप्रवासियों का विषय ज़ोर-शोर से उछलेगा. ट्रंप ने ये क़दम उठाकर अपने प्रतिद्वंदी डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रत्याशी जो बाइडेन को धर्मसंकट में डाल दिया है. क्योंकि, अगर वो ट्रंप के इस क़दम का विरोध करते हैं, तो इसे ये कह कर प्रचारित किया जाएगा कि वो आम अमेरिकी नागरिकों की बेरोज़गारी की समस्या की अनदेखी कर रहे हैं. ट्रंप ने कोरोना वायरस के मौजूदा संकट का फ़ायदा उठाकर अमेरिका की अप्रवासी नीति को नए सिरे से ढालने की कोशिश की है. ट्रंप ने ये जो नया कार्यकारी आदेश जारी किया है, ये अप्रैल में जारी उनके एक और कार्यकारी आदेश के बाद आया है, जिसमें उन्होंने अमेरिका आने के लिए ग्रीन कार्ड जारी करने पर दो महीने की रोक लगा दी थी. हालांकि, तकनीकी कंपनियों को डर है कि इससे उनके यहा काम करने के लिए आने वाले क़ाबिल लोगों की कमी हो जाएगी. इससे उनके इनोवेशन की प्रक्रिया पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा. लेकिन, अन्य लोग इसे ऐसे क़दम के तौर पर देख रहे हैं, जिससे अमेरिका की अप्रवासी वीज़ा नीति को बुनियादी तौर पर बदलने का काम ट्रंप कर रहे हैं.

अमेरिका हर साल लगभग 85 हज़ार H1B वीज़ा जारी करता है. इनमें से 70 प्रतिशत वीज़ा का लाभ भारतीय नागरिक उठाते हैं और अमेरिका में काम करने के अवसर पाते हैं. यानी, ट्रंप के इस क़दम से भारत की IT कंपनियों को तगड़ा झटका लगेगा.

अमेरिका की घरेलू राजनीति के समीकरण जो भी हों, भारत पर, अमेरिका की नई वीज़ा नीति का गहरा प्रभाव पड़ेगा. ख़ासतौर से H1B वीज़ा को लेकर. क्योंकि, इस वीज़ा के माध्यम से अमेरिकी कंपनियां, बेहद कार्यकुशल विदेशी कामगारों को नौकरी पर रख लेती हैं. जो अलग अलग क्षेत्रों में विशेषज्ञता या महारत रखते हैं. अमेरिका हर साल लगभग 85 हज़ार H1B वीज़ा जारी करता है. इनमें से 70 प्रतिशत वीज़ा का लाभ भारतीय नागरिक उठाते हैं और अमेरिका में काम करने के अवसर पाते हैं. यानी, ट्रंप के इस क़दम से भारत की IT कंपनियों को तगड़ा झटका लगेगा. क्योंकि, इन्हीं कंपनियों को अमेरिका के H1B वीज़ा का सबसे ज़्यादा लाभ मिलता रहा है. हालांकि, फिलहाल ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाई गई पाबंदियां नए कामगारों पर ही लागू होंगी. पहले से अमेरिका में काम कर रहे लोगों पर ये प्रतिबंध नहीं लागू होंगे. लेकिन, ट्रंप प्रशासन के इस क़दम से भारत सरकार के लिए मुश्किलें बढ़ गई हैं.

भारत सरकार, H1B वीज़ा को लेकर नियमित रूप से ट्रंप प्रशासन से संवाद करती आयी है. भारत सरकार का हमेशा से यही कहना रहा है कि, ‘आर्थिक और व्यापारिक संबंध ही हम दो देशों की सामरिक साझेदारी की बुनियाद हैं. ख़ासतौर से तकनीकी और इनोवेशन के क्षेत्र में.’ 2015 की नैसकॉम की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के IT सेक्टर ने न केवल अमेरिका में चार लाख से ज़्यादा नौकरियों का सृजन किया है. बल्कि, 2010 से 2015 के बीच भारतीय कंपनियों ने अमेरिका को टैक्स के रूप में 20 अरब डॉलर का योगदान भी दिया है. इस साल अप्रैल महीने में भारत सरकार ने अमेरिकी सरकार से अपील की थी कि वो भारतीय नागरिकों को H1B और दूसरे वीज़ा देने के सिलसिले को कोविड-19 की महामारी के दौरान भी जारी रखे.

इस बात की पूरी संभावना है कि भारत सरकार, ‘ट्रंप प्रशासन के इस क़दम की अनदेखी करने की कोशिश करेगी. क्योंकि, ट्रंप ने अप्रवासियों को लेकर ये क़दम उस संवेदनशील मौक़े पर उठाया है, जब भारत और चीन के बीच ज़बरदस्त तनातनी चल रही है.

इस बात की पूरी संभावना है कि भारत सरकार, ‘ट्रंप प्रशासन के इस क़दम की अनदेखी करने की कोशिश करेगी. क्योंकि, ट्रंप ने अप्रवासियों को लेकर ये क़दम उस संवेदनशील मौक़े पर उठाया है, जब भारत और चीन के बीच ज़बरदस्त तनातनी चल रही है. इस समय अप्रवासियों को वीज़ा, भारत और अमेरिका के संबंधों का सबसे बड़ा मुद्दा नहीं है. और दोनों देशों की सरकारें इस विषय से पर्दे के पीछे की गतिविधियों से निपटना चाहेंगी. भारत केवल यही अपेक्षा कर सकता है कि अमेरिका को आख़िरकार H1B वीज़ा के फ़ायदे अधिक दिखाई देंगे. जिनकी मदद से वो दुनिया के बाक़ी देशों से मुक़ाबले की होड़ में आगे निकल पाता है. और ख़ुद को बेहतर तकनीक से लैस कर पाता है. आज के दौर में अमेरिका के लिए ये तकनीकी बढ़त बनाए रखना और भी ज़रूरी हो गया है. क्योंकि, अमेरिका और चीन के बीच चल रहे संघर्ष में भौगोलिक तकनीकी प्रभुत्व भी एक बड़ा मुद्दा है.

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