शिंज़ो आबे की विशाल विरासत और भारत-जापान संबंध

शिंज़ो आबे ने जापान के एक ऐसे नेता के तौर पर प्रधानमंत्री पद को अलविदा कहा है, जिनकी नीतियों ने न केवल जापान के घरेलू राजनीति और अर्थनीति के माहौल को बदला, बल्कि उन्होंने वैश्विक सामरिक नीति पर भी गहरी छाप छोड़ी.

जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे ने अभी पिछले ही महीने ख़राब सेहत के चलते अपना पद छोड़ने की घोषणा की थी. जबकि, आबे ने पिछले ही साल सबसे लंबे समय तक जापान के प्रधानमंत्री पद पर रहने का रिकॉर्ड बनाया था. लेकिन, लगातार गिरती सेहत के चलते शिंज़ो आबे को अपना पद छोड़ना पड़ा. ये घोषणा करते हुए शिंज़ो आबे ने अपने देश की जनता से कहा कि, ‘मुझे माफ कीजिए कि मैं प्रधानमंत्री पद का अपना कार्यकाल ख़त्म होने से एक साल पहले ही पद छोड़ रहा हूं. वो भी कोरोना वायरस के संकट काल में. जबकि अभी भी इस महामारी से निपटने की नीतियों पर अमल शुरू ही हो रहा है.’ शिंज़ो आबे ने राजनीतिक परिदृश्य को उस वक़्त अलविदा कहा, जब वो एक के बाद एक लगातार छह बार चुनाव जीते थे. 2007 में शिंज़ो आबे ने पहली बार प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र दिया था. उसके बावजूद वर्ष 2012 में उन्होंने दोबारा बहुमत हासिल करके अपनी सरकार बनाई थी. ये जापान की राजनीति में एक दुर्लभ उपलब्धि थी. इसके बाद शिंज़ो आबे ने 2014 और 2017 के चुनावों में भी जीत हासिल की थी. अपनी लगातार चुनावी जीत के चलते शिंज़ो आबे जापान को वो राजनीतिक स्थिरता दे पाने में सफल हुए थे, जिसकी उनके देश को सख़्त दरकार थी. अब जबकि उन्होंने प्रधानमंत्री पद और राजनीति को अलविदा कहा है, तो आबे अपने पीछे एक ऐसा जापान छोड़ कर जा रहे हैं, जो पूरी तरह से बदल चुका है. फिर चाहे घरेलू राजनीति हो या जापान की विदेश नीति. और ऐसा तब दिख रहा है, जब शिंज़ो आबे ऐसी कई नीतियों को लागू नहीं कर पाए, जो उनके दिल के बेहद क़रीब थीं. जैसे कि, उत्तर कोरिया से उन जापानी नागरिकों को वापस लाने की बातचीत में उन्हें सफलता नहीं मिली, जिन्हें कई दशक पहले अगवा कर लिया गया था. न ही वो रूस के साथ सीमा विवाद को हल कर सके. यही नहीं, शिंज़ो आबे अपने सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट यानी दूसरे विश्व युद्ध के बाद संविधान में बदलाव करके जापान की सेना को और अधिकार देने के अपने सपने को भी नहीं पूरा कर सके.

अपनी लगातार चुनावी जीत के चलते शिंज़ो आबे जापान को वो राजनीतिक स्थिरता दे पाने में सफल हुए थे, जिसकी उनके देश को सख़्त दरकार थी. अब जबकि उन्होंने प्रधानमंत्री पद और राजनीति को अलविदा कहा है, तो आबे अपने पीछे एक ऐसा जापान छोड़ कर जा रहे हैं, जो पूरी तरह से बदल चुका है.

जापान एक ऐसा देश है, जहां बदलाव की रफ़्तार बेहद धीमी होती है. लेकिन, शिंज़ो आबे ने अपने कार्यकाल के पहले दिन से ही देश की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव की शुरुआत कर दी थी. आर्थिक मोर्चे की बात करें, तो उनकी मशहूर अर्थनीति को ‘अबेनॉमिक्स’ का नाम दिया गया था. शिंज़ो आबे ने अर्थव्यवस्था में खुलापन लाने के लिए बेहद क्रांतिकारी क़दम उठाए और कारोबार करने के रास्ते की अड़चनें दूर कीं. उन्होंने कम से कम अपने कार्यकाल के शुरुआती दिनों में सरकारी ख़र्च और अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक सुधारों के ज़रिए अपने देश को आर्थिक प्रगति की राह की ओर बढ़ाया. जबकि शिंज़ो आबे से पहले देश की अर्थव्यवस्था बिल्कुल स्थिर हो चुकी थी. कोविड-19 की महामारी के चलते जब जापान की अर्थव्यवस्था ठप हुई, तो उससे पहले एक लंबे समय तक जापान की अर्थव्यवस्था ने विस्तार का दौर देखा था. लेकिन, शिंज़ो आबे ने वो क़दम उठाने का साहस दिखाया, जो क़दम उठाने से उनके देश के रूढ़िवादी नेता इससे पहले डरते आए थे. जापान में घटते कामगारों की चुनौती से निपटने के लिए शिंज़ो आबे ने देश की अप्रवासी और लैंगिक नीतियों में सुधार की कोशिश की. महिलाओं को कामकाजी वर्ग में शामिल करने के लिए, शिंज़ो आबे ने कंपनियों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया कि वो महिलाओं को अधिक से अधिक नौकरियां दें. इसके लिए उन्होंने सरकार की ऐसी नीतियां बनाईं, जिनसे उन कंपनियों को इनाम दिए गए, जो महिलाओं को नौकरी पर रखती थीं. उन्होंने इन कंपनियों में बच्चों की रखवाली के लिए डे केयर सेंटर सरकार के ख़र्चे पर चलाने की व्यवस्था की. इन क़दमों से भले ही जापान में रोज़गार की तस्वीर पूरी तरह से न बदली हो. लेकिन, शिंज़ो आबे ने अपनी नीतियों से जापान के कॉरपोरेट सेक्टर को महिलाओं के प्रति अपने पक्षपाती व्यवहार को बदलने को मजबूर किया.

जापान में घटते कामगारों की चुनौती से निपटने के लिए शिंज़ो आबे ने देश की अप्रवासी और लैंगिक नीतियों में सुधार की कोशिश की. महिलाओं को कामकाजी वर्ग में शामिल करने के लिए, शिंज़ो आबे ने कंपनियों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया कि वो महिलाओं को अधिक से अधिक नौकरियां दें.

जापान की सुरक्षा नीति पर भी शिंज़ो आबे ने गहरी छाप छोड़ी. उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले पर जापान के रवैये में सुधार लाने की कोशिश की. ये परिवर्तन भले ही धीरे धीरे आया हो, लेकिन अब जापान के लोगों की सोच अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर निश्चित रूप से बदल चुकी है. शिंज़ो आबे का मानना था कि जापान को क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर अपनी सामरिक भूमिका को बढ़ाना चाहिए. उन्होंने इसके लिए जापान के रक्षा बजट में इज़ाफ़ा किया. उन्हें ये कहने में भी कोई संकोच नहीं था कि जापान को अपनी सामरिक शक्ति को बढ़ाना ही नहीं चाहिए. बल्कि उसे प्रदर्शित भी करना चाहिए. शिंज़ो आबे की सरकार ने देश के संविधान की नए सिरे से व्याख्या की, जिससे कि जापान की सेनाओं को दूसरे विश्व युद्ध के बाद पहली बार अन्य देशों में तैनात किए जाने का रास्ता खुला. इसके अलावा जापान ने शिंज़ो आबे के राज में ही अपने किसी दोस्त देश पर हमले के समय उसकी रक्षा के अधिकार को दोबारा हासिल किया, जिस पर लंबे समय से प्रतिबंध लगा हुआ था.

घरेलू मोर्चे पर जापान की नीतियों में इन बदलावों की मदद से शिंज़ो आबे ने अपने देश के लिए क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर मज़बूती से अपने संबंध विकसित करने का अवसर बनाया. डोनाल्ड ट्रंप के शासन काल में अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों के प्रति भी लेन-देन वाली ही नीति अपनाए रखी. इसके बावजूद, शिंज़ो आबे ने अमेरिका और जापान के संबंधों का संतुलन बनाए रखा. विश्व के सुरक्षा ढांचे में अब जापान की भूमिका इतनी बढ़ गई है कि अब उसके फाइव आईज़ (Five Eyes) ख़ुफ़िया साझेदारी का हिस्सा बनने को लेकर भी चर्चा हो रही है. फ़ाइव आईज़, अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और न्यूज़ीलैंड का ऐसा गठबंधन है, जिसके तहत वो ख़ुफ़िया जानकारियां आपस में शेयर करते हैं. वहीं, क्षेत्रीय स्तर पर शिंज़ो आबे पहले नेता थे, जिन्होंने वर्ष 2007 में ही हिंद-प्रशांत क्षेत्र को लेकर एक सामरिक दृष्टिकोण दिया था. उस साल शिंज़ो आबे ने भारतीय संसद में दिए गए अपने भाषण में हिंद प्रशांत क्षेत्र के दृष्टिकोण को दो महासागरों के संगम का नाम दिया था. और, शिंज़ो आबे ने अपनी इसी सामरिक दूर दृष्टि के आधार पर अपने देश की विदेश नीति को आगे बढ़ाया. अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने तमाम क्षेत्रीय शक्तियों के साथ संबंधों को नए सिरे से ढालने की कोशिश की. इस दौरान जापान ने भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ अपने संबंध और मज़बूत किए. तो, दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के साथ रक्षा साझेदारी विकसित की.

भारत के लिए शिंज़ो आबे, हमेशा बेहद ख़ास जापानी नेता बने रहेंगे. भारत को लेकर शिंज़ो आबे के दिल में बहुत लगाव है. और इसी वजह से उन्होंने हिंद प्रशांत क्षेत्र की सामरिक साझेदारी के तहत, भारत और जापान के संबंधों को नई ऊंचाई पर ले जाने का दृष्टिकोण दिया. अपने पहले कार्यकाल में भारत का दौरा करने के बाद, शिंज़ो आबे ने जापान और भारत के संबंधों को नई धार और रफ़्तार दी. वो भारत का तीन बार दौरा करने वाले जापान के पहले प्रधानमंत्री बने. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ शिंज़ो आबे के रिश्ते बेहद दोस्ताना रहे. दुनिया को लेकर दोनों नेताओं की एक जैसी दृष्टि होने के कारण, हाल के वर्षों में भारत और जापान के संबंधों ने नई ऊंचाइयां हासिल की हैं. शिंज़ो आबे के कार्यकाल के दौरान ही भारत और जापान के संबंधों की राह का आख़िरी कांटा भी निकल गया. जब जापान ने भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश मानने से अपने इनकार को इकरार में बदला. 2016 मे भारत और जापान के बीच नागरिक परमाणु समझौते पर दस्तख़त किए गए.

भारत के लिए शिंज़ो आबे, हमेशा बेहद ख़ास जापानी नेता बने रहेंगे. भारत को लेकर शिंज़ो आबे के दिल में बहुत लगाव है. और इसी वजह से उन्होंने हिंद प्रशांत क्षेत्र की सामरिक साझेदारी के तहत, भारत और जापान के संबंधों को नई ऊंचाई पर ले जाने का दृष्टिकोण दिया.

चीन के आक्रामक रुख़ को देखते हुए जापान और भारत ने आपसी संबंधों को और अधिक महत्वाकांक्षी स्तर पर ले जाने का फ़ैसला किया है. आज जापान, भारत के साथ मिलकर पूर्वोत्तर के क्षेत्र में साझा प्रोजेक्ट चला रहा है. इसके अलावा दक्षिण एशिया के अन्य क्षेत्रो में भी भारत और जापान साझा प्रोजेक्ट विकसित कर रहे हैं. 2017 में जापान और भारत ने चार देशों के गठबंधन (QUAD) में नई जान फूंकने का फ़ैसला किया. इसके अलावा जापान और भारत साथ मिल कर संपर्क बढ़ाने के साझा प्रोजेक्ट जैसे कि एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर विकसित कर रहे हैं. आज जब भारत पूर्वी और दक्षिणी पूर्वी एशिया में अपनी पहुंच का विस्तार कर रहा है, तो उसे जापान से पूरा सहयोग मिल रहा है. चीन के साथ सीमा विवाद में भी जापान ने खुलकर भारत का साथ दिया है. ये शिंज़ो आबे ही हैं, जिनके नेतृत्व में ही जापान और भारत के संबंधों का दायरा इतना व्यापक हुआ है.

अब जबकि शिंज़ो आबे ने राजनीतिक मंच को अलविदा कह दिया है, तो वो अपने पीछे एक भारी भरकम विरासत छोड़ गए हैं. शिंज़ो आबे ने जापान के एक ऐसे नेता के तौर पर प्रधानमंत्री पद को अलविदा कहा है, जिनकी नीतियों ने न केवल जापान के घरेलू राजनीति और अर्थनीति के माहौल को बदला, बल्कि उन्होंने वैश्विक सामरिक नीति पर भी गहरी छाप छोड़ी. शिंज़ो आबे ख़ुद को एक रूढ़िवादी नेता कहते रहे हैं. और उनके इस स्वघोषित बयान को देखते हुए शिंज़ो आबे की उपलब्धियां बेहद शानदार रही हैं.

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