भारतीय सैन्य-परिवेश में उन्नत लेकिन विध्वंशकारी टेक्नोलॉजी के प्रयोग पर ज़ोर

ज़ाहिर है कि ऐसी तकनीकों का स्वदेशी उत्पादन कर उनका वास्तविक रूप से सेना में शामिल करना एक जटिल मसला बना हुआ है. इसलिए इस तरह के इन्नोवेशन के वास्ते अनुकूल माहौल बनाना सरकार के लिए ज़रूरी है.

भारतीय सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने सही समय पर कदम उठाते हुए देश की सशस्त्र सेनाओं से “उपलब्ध विध्वंशकारी टेक्नोलॉजी (disruptive technologies), जिनका दोहरा इस्तेमाल किया जा सकता है और जिन्हें कारोबारी संस्थाओं और इन्नोवेशन संस्थानों द्वारा संचालित किया जा रहा है, पर पर्याप्त ध्यान दिए जाने” और उनका “भारतीय संदर्भ” में अनुकूलन किए जाने का आह्वान किया. इस पर इस कोशिश के विस्तार के रूप में भारत के अग्रणी रक्षा टेक्नोलॉजी सप्लायर रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) ने अपनी 57 प्रयोगशालाओं का पुनः आकलन करने और उनकी टेक्नोलॉजिकल ओवरलैपिंग को कम कर दक्षता बढ़ाने की ज़िम्मा सौंपते हुए एक पैनल गठित किए जाने की सूचना दी है. यह ऐसे समय में हुआ है जब नई दिल्ली के सामरिक जोखिम न केवल बढ़े हैं, बल्कि इसका टेक्नोलॉजी में पिछड़ेपन का अंतर भी ख़तरनाक ढंग से बढ़ा है. सरकारी और ग़ैर-सरकारी दोनों तरह के कारकों का सामना करते हुए विध्वंशकारी टेक्नोलॉजी का आधुनिकीकरण भारत की युद्ध-क्षमता में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है. चीन-पाकिस्तान गठजोड़ मजबूत करने के साथ पाकिस्तान की अपने गैर-सरकारी कारकों से नज़दीकी विध्वंशकारी टेक्नोलॉजी को जानबूझकर लीक करने की संभावना के बीच, भारतीय रक्षा रणनीतिकारों के लिए सोच के परंपरागत दायरों से बाहर निकलना जरूरी है.

सरकारी और ग़ैर-सरकारी दोनों तरह के कारकों का सामना करते हुए विध्वंशकारी टेक्नोलॉजी का आधुनिकीकरण भारत की युद्ध-क्षमता में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है.

ऐसी टेक्नोलॉजी के ग़लत हाथों में पहुंच जाने की नई दिल्ली की चिंताएं निराधार नहीं हैं. यमन में हाउथी विद्रोहियों ने सितंबर 2019 में सऊदी अरब के पेट्रोलियम प्रतिष्ठान पर कामयाब हमले की ज़िम्मेदारी ली थी, जिसे समन्वित स्वार्म ड्रोन हमले की मदद से अंजाम दिया गया था. खुलेआम उपलब्ध टेक्नोलॉजी का दुरुपयोग करने वाले ग़ैर-सरकारी तत्वों के अन्य उदाहरणों में शामिल है यूक्रेन के सरकारी गोला-बारूद गोदाम पर कथित रूप से यूक्रेनी अलगाववादियों द्वारा 2015 और 2017 के बीच ड्रोन से की गई थर्माइट ग्रेनेड की बमबारी में बड़े पैमाने पर तबाही हुई. देश के अंदर देखें तो, पाकिस्तान समर्थित ग़ैर-सरकारी तत्वों ने पंजाब में आतंकी हमलों और केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर व लद्दाख में आंतरिक अस्थिरता पैदा करने के लिए हथियार पहुंचाने में ड्रोन का इस्तेमाल किया. एडिटिव लेयर मैन्युफैक्चरिंग (3 डी-प्रिंटिंग) का विकास और इससे ड्रोन जैसे उपकरणों के उत्पादन की लागत काफी कम हो जाने की संभावना के साथ, गै़र-सरकारी तत्वों के लिए इस तरह की टेकनोलॉजी तक पहुंच और बढ़ जाएगी.

हालांकि, विश्लेषकों का कहना है कि इन विध्वंशकारी टेक्नोलॉजी को सैन्य तैयारियों में जादुई बदलाव लाने वाली नहीं माना जाना चाहिए, लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि इनके हासिल होने से क्षेत्र में राष्ट्र को तुलनात्मक प्रतिस्पर्धी लाभ मिल सकता है. बीते एक दशक में टेक्नोलॉजी और उसके संभावित इस्तेमाल में कई ख़ामियां रही हैं, जिन्हें दुनिया के देशों ने अपनाकर अपनी क्षमताओं और विकल्पों के क्षेत्र में बढ़त बनाई है. प्रगति के मोर्चे पर कई महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी हैं जो समकालीन सैन्य क्षमताओं में महत्वपूर्ण रूप से फेरबदल करती हैं. विध्वंश की सबसे ज़्यादा क्षमताओं के साथ शायद सबसे ज्ञात और विकासशील क्षेत्र है- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या एआई.

एआई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल युद्धनीति में कई तरह के सर्वे को एक साथ मिलाकर देखने, मशीन सीखने, डेटा सर्च करने और उसका विश्लेषण करने और निर्णय लेने को ऑटोमेटेड करने में किया जा सकता है.

एआई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल युद्धनीति में कई तरह के सर्वे को एक साथ मिलाकर देखने, मशीन सीखने, डेटा सर्च करने और उसका विश्लेषण करने और निर्णय लेने को ऑटोमेटेड करने में किया जा सकता है. एआई अपने अनोखे और विकसित एल्गोरिदम के ज़रिये सेना के लिए ऐसा मंच मुहैया करा सकती है जो साइबर हमले, पारंपरिक हमले और दूसरे किस्म के इलेक्ट्रॉनिक हमलों पर तेजी से प्रतिक्रिया दे सकता है. 1991 में पहले खाड़ी युद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा DART लॉजिस्टिक्स और युद्ध क्षेत्र प्रबंधन प्रणाली में शामिल किए जाने के बाद से एआई की व्यापक रेंज का सैन्य उपयोग किया जा रहा है. इसके नतीजे में रूस और चीन के अलावा अन्य प्रमुख सेनाओं ने इसका इस्तेमाल बढ़ाया है. भारत ने 2018 में अपने सैन्य कार्यों में एआई का इस्तेमाल बढ़ाने के लिए रणनीति तैयार करने को 2018 में कई संबंधित विभागों की एक टास्क फोर्स का गठन किया, जिसके बाद 2019 में डिफेंस एआई काउंसिल की स्थापना हुई है.

एआई के सबसे चर्चित विस्तार में से एक है स्मार्ट ऑटोनोमस अनमैंड (एरियल/ ग्राउंड / अंडरवाटर) व्हीकल बनाने के लिए रोबोटिक्स में इसका इस्तेमाल. युद्ध में इसका इस्तेमाल हताहतों की संख्या को कम करने, इंटेलिजेंस, निगरानी और टोही (ISR) संयोजन से लेकर बहुत ख़राब मौसम के हालात में होता है. इस क्षेत्र के दिग्गज ‘ड्रोन स्वार्म्स’ बनाकर एक कदम आगे निकल गए हैं, जिसमें ड्रोन का एक बड़ा समूह एकीकृत होकर कई तरह के जटिल सैन्य अभियानों को अंजाम दे सकता है. इस खोज में शामिल अमेरिका ने अपना कम लागत वाला अनमैन्ड एरियल व्हीकल (UAV) स्वार्म टेक्नोलॉजी (LOCUST) बनाया है. चीन के विशेषज्ञों ने अपनी ड्रोन क्षमताओं को एनालिस्ट स्पेकुलेटिंग के साथ इस तरह बड़े पैमाने पर सज्जित किया है कि प्रत्येक ड्रोन मोर्टार, ग्रेनेड और मशीनगनों के साथ नेटवर्क से कनेक्टेड और समन्वित हमले में सक्षम है. भारत को अपने शुरुआती यूएवी इज़रायल के सर्चर्स और हेरॉन्स के साथ लंबा सफ़र तय करना है, जबकि देश में विकसित कुछ मॉडल यूएवी  क्षमताओं में तुलनात्मक रूप से काफ़ी पिछड़े हैं. हालांकि, 2019 में अमेरिका और भारत ने अपनी रक्षा टेक्नोलॉजी व्यापार समझौते के तहत ऐलान किया था कि वे संयुक्त रूप से स्वार्म ड्रोन और एंटी-ड्रोन सिस्टम विकसित करेंगे. इस तरह की टेक्नोलॉजी भारतीय सेना के लिए काफ़ी उपयोगी हो सकती है, ख़ासकर अक्साई चिन जैसे दुर्गम इलाक़ों में गश्त करने में.

एआई में फोटो और वीडियो दोनों में हेराफेरी कर जालसाज़ी करने, आम धारणा को नियंत्रित करने के लिए समर्थकों को सक्षम बनाने, जन विश्वास को नष्ट करने, झूठी ख़बरें फैलाने की क्षमता है. इस नई ‘डीप फ़ेक और दुस्सूचना’ क्षमता का इस्तेमाल शांति और युद्धकाल में किया जा सकता है जिससे विरोधियों की सरकारी मशीनरी को कमज़ोर किया जा सकता है और देश में अराजकता पैदा की जा सकती है. यूएस डिफेंस एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी के पास इसका सामना करने के लिए एक मीडिया फोरेंसिक प्रोजेक्ट है, जिसे ख़ासतौर से इस तरह के युद्ध का पता लगाने के लिए डिज़ाइन किया गया है. भारत पर भी विभिन्न बिंदुओं पर डीप फे़क हमले हुए हैं, लेकिन इसके पास इस विध्वंशकारी टेक्नोलॉजी का मुकाबला करने के लिए सुसंगत नीति या रणनीति का अभाव है.

भविष्य में क्वांटम टेक्नोलॉजी पर नियंत्रण पाने और सैन्य क्षेत्र में इसे शामिल करने की संभावना से विध्वंशकारी टेक्नोलॉजी में एक कदम आगे बढ़ने का रास्ता तय होगा. चीन इस इनोवेशन के शीर्ष पर है, जो एक बार हासिल कर लेने के बाद कई संभावनाओं को जन्म देता है.

अपने विनाशकारी असर के साथ हाइपरसोनिक हथियार इस समय चलन में दिखाई देते हैं, उनके क्रूज़ (1,00,000 फ़ुट तक की ऊंचाई तक सक्षम) और ग्लाइड (1,00,000 फ़ुट से अधिक ऊंचाई पर सक्षम) वर्ज़न के साथ मौजूदा ‘हाइपरसोनिक हथियारों की दौड़’ का नेतृत्व चीनी डीएफ-17, रूसी सरमत और यूएस के पारंपरिक हाइपरसोनिक मारक हथियारों द्वारा किया जा रहा है. इन हथियारों की उपयोगिता उनकी गति में निहित है जो ध्वनि की गति की लगभग पांच गुना (मैक 5) है और इसके चलते उन्हें तेज़ गति और सटीकता से दुश्मन को इनका पता लगाने के लिए बहुत थोड़ा मौका देने के साथ लक्ष्य भेदने की क्षमता मिलती है. भारत भी 2019 में देश में विकसित अपने हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी डिमॉन्स्ट्रेटर व्हीकल (HSTDV) के साथ इस दौड़ में शामिल हो गया है, जिसकी रफ्तार मैक 6 तक हो सकती है.

हाइपरसोनिक हथियारों से एक कदम आगे ‘डायरेक्टेड एनर्जी वेपंस’  (डीईडब्ल्यू) का विकास है जो तमाम कामों के लिए जिसमें भीड़ नियंत्रण और एक तय दायरे में इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को तबाह करने से लेकर अंतरिक्ष में तेज़ी से सटीकता से किसी उपकरण को तबाह करने के लिए मुख्य रूप से मिलीमीटर तरंगों, माइक्रोवेव और विद्युत चुंबकीय कंपन का इस्तेमाल करता है. अमेरिका के बाद, चीन ने भी कई तरह के डीईडब्ल्यू एंटी-सेटेलाइट लेज़र से लेकर अन्य उच्च शक्ति वाले माइक्रोवेव, रेलगन, रेडियोफ्रीक्वेंसी और पार्टिकल बीम युद्ध-सामग्री तैयार की है. डीआरडीओ ने पूरी तरह डीईडब्ल्यू विकसित करने को समर्पित सेंटर फ़ॉर हाई एनर्जी सिस्टम्स एंड साइंसेज़ और लेज़र साइंस एंड टेक्नोलॉजी की स्थापना की है, लेकिन एक तैनात किए जा सकने लायक हथियार के उत्पादन का अभी तक इंतज़ार है.

भविष्य में क्वांटम टेक्नोलॉजी पर नियंत्रण पाने और सैन्य क्षेत्र में इसे शामिल करने की संभावना से विध्वंशकारी टेक्नोलॉजी में एक कदम आगे बढ़ने का रास्ता तय होगा. चीन इस इनोवेशन के शीर्ष पर है, जो एक बार हासिल कर लेने के बाद कई संभावनाओं को जन्म देता है. क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन, क्वांटम क्रिप्टानालिसिस और क्वांटम सेंसिंग के तहत इसका सैन्य उपयोग पूरी तरह से सैन्य क्षेत्र को बदलने की क्षमता रखता है. ऐसा आकलन किया गया है कि एक बार हासिल करने के बाद, यह टेक्नोलॉजी सेना को हैक-प्रतिरोधी संचार नेटवर्क प्रदान कर सकती है, और युद्ध क्षेत्र में बेजोड़ कम्प्यूटेशनल श्रेष्ठता दे सकती है.

इस तरह के इनोवेशन के वास्ते अनुकूल माहौल बनाना सरकार के लिए ज़रूरी है, क्योंकि इनमें से अधिकांश टेक्नोलॉजी व्यावसायिक गतिविधियों के लिए तैयार की जाती हैं और फिर दोहरे इस्तेमाल की प्रकृति के कारण सेना की जरूरतों के हिसाब से इनको विकसित और हस्तांतरित किया जा सकता है.

इन महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजिकल प्रगति के बीच डीआरडीओ अभी भी टेक्नोलॉजी के ज़्यादा पारंपरिक रूपों के विकास में उलझा हुआ है, क्योंकि देरी, बजट की कमी और पुरानी टेक्नोलॉजी जैसी कई तरह की समस्याओं से इसका सामना जारी है. हालांकि, पूर्व में मिसाइल, साइबर और अंतरिक्ष के भारतीय कार्यक्रमों में काफी तरक़्क़ी हुई है, फिर भी नई और उभरती हुई विध्वंशकारी टेक्नोलॉजी से पेश चुनौतियों का नियमित रूप से जवाब देने के लिए रफ़्तार बढ़ाना बहुत ज़रूरी है.

ज़ाहिर है कि ऐसी तकनीकों का स्वदेशी उत्पादन कर उनका वास्तविक रूप से सेना में शामिल करना एक जटिल मसला बना हुआ है. इसलिए इस तरह के इनोवेशन के वास्ते अनुकूल माहौल बनाना सरकार के लिए ज़रूरी है, क्योंकि इनमें से अधिकांश टेक्नोलॉजी व्यावसायिक गतिविधियों के लिए तैयार की जाती हैं और फिर दोहरे इस्तेमाल की प्रकृति के कारण सेना की जरूरतों के हिसाब से इनको विकसित और हस्तांतरित किया जा सकता है. नतीजतन, स्वदेशी इनोवेशन और यथार्थवादी टेक्नोलॉजिकल विकास के लिए नागरिक-सैन्य तालमेल महत्वपूर्ण है. भारत सरकार द्वारा इन विध्वंशक टेक्नोलॉजी को शामिल करने पर ध्यान केंद्रित करने के लिए हालिया उपाय स्वागतयोग्य कदम हैं, इन इनोवेशन को हासिल करने के लिए एकमात्र हकीक़त में बदलने वाला और क़िफ़ायती रास्ता सरकार द्वारा टिकाऊ वाणिज्यिक घरेलू इकोसिस्टम के सावधानीपूर्वक पोषण में निहित है.

इस दिशा में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया संबोधन जिसमें उन्होंने नीतिगत सुधारों के माध्यम से भारतीय रक्षा क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाने पर ज़ोर दिया है, जैसे कि 101 हथियार प्रणालियों के आयात पर प्रतिबंध लगाना और रक्षा मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में 74 फ़ीसद प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ़डीआई) को स्वचालित मंजूरी देना, सकारात्मक संकेत देता है कि नई दिल्ली स्वदेशी इनोवेशन और उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है. भारत के सामरिक वातावरण को देखते हुए, इस तरह के बढ़त दिलाने वाले इनोवेशन को शामिल करने से न केवल अपने प्रतिद्वंद्वियों की बराबरी करने में मदद मिलेगी बल्कि गैर-पारंपरिक ख़तरों का सामना करने की सैन्य तैयारी भी सुनिश्चित होगी.

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