कौन बनेगा विश्व व्यापार संगठन का नया महानिदेशक?

चुनाव से पहले जब हर देश इस बात पर विचार कर रहा है कि वो किस उम्मीदवार का समर्थन करे, तो उन्हें इस बात का ध्यान भी रखना होगा कि विश्व व्यापार संगठन के महानिदेशक कौन कौन सी ज़िम्मेदारियां निभाते हैं.

इस साल 31 अगस्त को रॉबर्टो अज़ेवेदो ने आधिकारिक रूप से विश्व व्यापार संगठन (WTO) के महानिदेशक का पद छोड़ दिया था. रॉबर्टो अज़ेवेदो का अचानक इस्तीफ़ा देना एक चौंकाने वाला फ़ैसला था. क्योंकि अभी उनके आठ बरस के कार्यकाल का एक साल बाक़ी था. रॉबर्टो के इस्तीफ़े के चलते, विश्व व्यापार संगठन ठीक उस वक़्त नेतृत्व विहीन हो गया, जब कोविड-19 की महामारी के चलते उत्पन्न परिस्थिति में इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी. क्योंकि, इस महामारी का लाभ उठाकर पूरी दुनिया में भूमंडलीकरण विरोधी ताक़तें सक्रिय हो गईं. विश्व के बहुत से देशों का WTO जैसी बहुपक्षीय संस्थाओं पर से विश्वास उठ रहा है. विश्व व्यापार संगठन की वार्ताएं अटक गई हैं. इसकी विवादों के निपटारे की व्यवस्था भी निर्जीव हो गई है. आज पूरी दुनिया में संरक्षणवादी व्यापारिक नीतियों को बढ़ावा दिया जा रहा है. इसी दौरान दुनिया की दो बड़ी आर्थिक शक्तियों, चीन और अमेरिका के बीच तकनीकी और व्यापार युद्ध चल रहा है. जिसके कारण उन नियमों को चोट पहुंच रही है, जो वैश्विक आर्थिक प्रशासन की धुरी रहे हैं.

ऐसे माहौल में जो भी विश्व व्यापार संगठन का नया महानिदेशक बनता है, उसके लिए चुनौती बड़ी होगी. एक तरफ़ तो उसे WTO को इन चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करना होगा. तो दूसरी तरफ़, ख़ुद विश्व व्यापार संगठन की रीति नीति का संरक्षण और प्रचार करने की चुनौती भी होगी. और दुनिया से आर्थिक मामलों में विश्व व्यापार संगठन का प्रभुत्व मनवा पाना एक बड़ा चैलेंज होगा. ऐसे में ज़रूरत इस बात की है, कि WTO के महानिदेशक के तौर पर ऐसे व्यक्ति का चुनाव हो, जो कद्दावर राजनीतिक हैसियत रखता हो, जिसके पास व्यापार और कूटनीतिक वार्ताओं का लंबा और व्यापक अनुभव हो. यूरोपीय यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ने विश्व व्यापार संगठन के साझीदार देशों और व्यापारिक वार्ताएं संचालित करने वालों के बीच इस बात को लेकर एक सर्वे किया था कि वो WTO के नए महानिदेशक में कौन से गुणों की अपेक्षा करते हैं. सर्वे में शामिल लोगों ने कहा कि उन्हें विश्व व्यापार संगठन के महानिदेशक पद के लिए ऐसे व्यक्ति की तलाश है, जो लंबे राजनीतिक तजुर्बे वाला इंसान हो, जिसे आर्थिक मामलों की अच्छी समझ हो. और जिसमें, विश्व व्यापार संगठन की वार्ताएं संचालित करने की क़ाबिलियत हो.

ऐसे माहौल में जो भी विश्व व्यापार संगठन का नया महानिदेशक बनता है, उसके लिए चुनौती बड़ी होगी. एक तरफ़ तो उसे WTO को इन चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करना होगा. तो दूसरी तरफ़, ख़ुद विश्व व्यापार संगठन की रीति नीति का संरक्षण और प्रचार करने की चुनौती भी होगी.

कैसे चुने जाते हैं विश्व व्यापार संगठन के महानिदेशक?

WTO के नए महानिदेशक के चुनाव की प्रक्रिया तभी शुरू हो गई थी, जब रॉबर्टो अज़ेवेदो ने मई 2020 में अपने पद से इस्तीफ़ा देने की घोषणा की थी. जून से जुलाई महीने के दौरान, रॉबर्ट अज़ेवेदो के सदस्यों ने इस पद के लिए अपने नामांकन दाख़िल किए थे. केन्या, मॉल्दोवा, मिस्र, सऊदी अरब, मेक्सिको, नाइजीरिया, साउथ कोरिया और ब्रिटेन के आठ प्रत्याशियों को इस पद के लिए नामांकित किया गया था. नामांकन के बाद सभी उम्मीदवारों ने विश्व व्यापार संगठन को लेकर अपना विज़न दुनिया के सामने रखा. सदस्य देशों के बारे में अपनी राय बताई और अपनी उम्मीदवारी को लेकर किए गए सवालों के जवाब भी दिए.

सितंबर महीने से विश्व व्यापार संगठन के 164 देशों से उनकी पसंद नापसंद को लेकर बातचीत शुरू की गई. जिससे ये पता लग सके कि वो किस उम्मीदवार का समर्थन करते हैं. इस प्रक्रिया का मक़सद किसी एक प्रत्याशी के नाम पर आम सहमति बनाना होता है. जिससे आठ से घट कर किसी एक प्रत्याशी के नाम पर WTO के सभी सदस्य देशों को राज़ी किया जा सके. इस प्रक्रिया का संचालन, विश्व व्यापार संगठन की तीन प्रमुख कमेटियों के अध्यक्षों द्वारा किया जाता है. ये समितियां हैं, द जनरल काउंसिल (GC), डिस्प्यूट सेटेलमेंट बॉडी (DSB) और ट्रेड पॉलिसी रिव्यू बॉडी (TPRB). इस प्रक्रिया का एक चरण पहले ही पूरा हो चुका है. कुल आठ उम्मीदवारों में से तीन छांटे जा चुके हैं. और बाक़ी के पांच प्रत्याशी अगले राउंड में पहुंच चुके हैं. इनमें नाइजीरिया की एनगोई ओकोंजो-आइवियाला, साउथ कोरिया की यू म्यूंग-ही, केन्या की अमीना मोहममद, सऊदी अरब के मोहम्मद मज़ाएद अल-तुवैजरी और ब्रिटेन के लियाम फॉक्स शामिल हैं. अगर ये प्रक्रिया एक सही दिशा में चलती रही, तो सात नवंबर तक विश्व व्यापार संगठन के नए महानिदेशक का ऐलान कर दिया जाना चाहिए. 

आम सहमति की राह के रोड़ों की पहचान

लेकिन, इस बात की पूरी आशंका है कि WTO के नए महानिदेश की चयन प्रक्रिया इस डेडलाइन को पार कर जाएगी. इसकी एक वजह तो ये है कि अमेरिका अपने यहां हो रहे चुनाव के कारण, विश्व व्यापार संगठन का नया महानिदेशक चुनने की प्रक्रिया को उतनी तवज्जो नहीं दे पा रहा है. दूसरा कारण ये है कि बाक़ी के सदस्य देशों के बीच किसी एक उम्मीदवार के नाम पर आम सहमति बन पाना क़रीब क़रीब असंभव है. इसके भी दो कारण हैं. पहली बात तो ये है कि अमेरिका और चीन के बीच विश्व पर अपना प्रभुत्व जमाने की प्रतिद्वंदिता लगातार बढ़ती जा रही है. इसी कारण से विश्व व्यापार संगठन के महानिदेशक के चुनाव की प्रक्रिया का भी राजनीतिकरण हो गया है. और दूसरी वजह ये भी है कि WTO के सामने विकसित और विकासशील देशों के बीच मतभेद बढ़ते ही जा रहे हैं. ये मतभेद कितने गहरे हो चुके हैं, ये इसी बात से समझा जा सकता है कि महानिदेशक के इस्तीफ़ा देने के बाद, WTO के सदस्य देश एक उप महानिदेशक की नियुक्ति को लेकर भी सहमत नहीं हो सके. जबकि इसके 2002 के नियमों के अनुसार महानिदेशक की अनुपस्थिति में विश्व व्यापार संगठन के कार्यों के संचालन के लिए सदस्य देशों को एक उप महानिदेशक की नियुक्ति करनी चाहिए. इस एक मिसाल से स्पष्ट है कि WTO के सदस्य देशों के बीच आम सहमति बना पाना कितना मुश्किल होता जा रहा है.

महानिदेशक के इस्तीफ़ा देने के बाद, WTO के सदस्य देश एक उप महानिदेशक की नियुक्ति को लेकर भी सहमत नहीं हो सके. जबकि इसके 2002 के नियमों के अनुसार महानिदेशक की अनुपस्थिति में विश्व व्यापार संगठन के कार्यों के संचालन के लिए सदस्य देशों को एक उप महानिदेशक की नियुक्ति करनी चाहिए.

अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रमुखों का चुनाव करना एक राजनीतिक प्रक्रिया होती है. इसके पीछे प्रभावशाली देशों की ज़बरदस्त लॉबीइंग भी काम करती है. उदाहरण के लिए जब संयुक्त राष्ट्र के महासचिव का चुनाव होता है, तो इसके लिए सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों (P5) के बीच सहमति बनना ज़रूरी होती है. इसका नतीजा ये होता है कि कुछ गिने चुने लोगों के बीच से ही महासचिव का चुनाव होता आया है. विश्व व्यापार संगठन के महानिदेशक का चुनाव करना तब आसान होता, अगर इसके तमाम सदस्य देश इस बात पर राज़ी हो जाते कि किस व्यक्ति को इस पद के लिए चुनना है. लेकिन, अक्सर सदस्य देशों के बीच उम्मीदवारों को लेकर मतभेद उभर आते हैं. ख़ास तौर से विकसित और विकासशील देशों के बीच जो फ़र्क़ है, उसके कारण ये मतभेद और उभरते हैं. वर्ष 2013 में विश्व व्यापार संगठन के महानिदेशक का चुनाव, WTO में ब्राज़ील के राजदूत और मुख्य व्यापार व्राताकार रॉबर्टो अज़ेवेदो और मेक्सिको के पूर्व व्यापार मंत्री हर्मिनियो ब्लैंको के बीच होना था. रॉबर्टो अज़ेवेदो को विकासशील देशों और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं का समर्थन हासिल था. वहीं, विकसित देश हर्मिनियो ब्लैंको का समर्थन कर रहे थे क्योंकि वो मुक्त व्यापार के कट्टर हामी थे. जब 2013 में आख़िरकार रॉबर्टो अज़ेवेदो, महानिदेशक चुने गए, तो भारत के तत्कालीन वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने उनके चुनाव का समर्थन और स्वागत ये कहते हुए किया था कि इससे विश्व व्यापार संगठन में विकासशील देशों और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की बढ़ती अहमियत का पता चलता है

इससे पहले वर्ष 2002 में WTO महानिदेशक के चुनाव में विकसित और विकासशील देशों के बीच मतभेद और खुलकर सामने आए थे. बात तब टकराव की स्थिति में पहुंच गई, जब सदस्य देशों को थाइलैंड के पूर्व उप प्रधानमंत्री सुपाचाई पनितचपकदी और न्यूज़ीलैंड के पूर्व प्रधानमंत्री माइक मूर में से किसी एक को महानिदेशक चुनना था. जहां एक ओर अमेरिका, माइक मूर की उम्मीदवारी का समर्थन कर रहा था, वहीं लैटिन अमेरिका और एशिया के विकासशील देश और जापान, सुपाचाई पनितचपकदी को WTO महानिदेशक बनाना चाहते थे. सुपाचाई पनितचपकदी को माइक मूर से ज़्यादा देशों का समर्थन हासिल था. फिर भी जब अमेरिका और यूरोपीय देशों ने मिलकर माइक मूर को महानिदेशक बनाने के लिए सदस्य देशों पर दबाव बनाना शुरू किया, तो भारत समेत कई देश क्रुद्ध हो गए थे.

इससे पहले वर्ष 2002 में WTO महानिदेशक के चुनाव में विकसित और विकासशील देशों के बीच मतभेद और खुलकर सामने आए थे. बात तब टकराव की स्थिति में पहुंच गई, जब सदस्य देशों को थाइलैंड के पूर्व उप प्रधानमंत्री सुपाचाई पनितचपकदी और न्यूज़ीलैंड के पूर्व प्रधानमंत्री माइक मूर में से किसी एक को महानिदेशक चुनना था.

इस विवाद के कारण थाईलैंड और अमेरिका के संबंध ख़राब हो गए थे. कूटनीतिक टकराव के चलते, WTO के नए महानिदेशक का चुनाव एक साल के लिए टल गया था. और आख़िरकार इस बात पर सहमति बनी कि माइक मूर और सुपाचाई पनितचपकदी तीन तीन साल तक WTO के महानिदेशक का पद बारी बारी से संभालेंगे. दुर्भाग्य की बात ये थी कि महानिदेशक के चुनाव का पूरी तरह से राजनीतिकरण हो गया था. और इसका नतीजा ये हुआ कि ऐसे लोग महानिदेशक चुने गए जो एक ख़ास राजनीतिक विचारधारा के पूर्वाग्रह के शिकार थे. माइक मूर के कार्यकाल की विरासत इस बात की गवाह है. क्योंकि विश्लेषकों का मानना है कि जब माइक मूर विश्व व्यापार संगठन के महानिदेशक थे, तो उन्होंने कुछ ख़ास देशों के हितों को बढ़ावा दिया था और व्यापार वार्ताओं में कुछ नए एजेंडा और मुद्दों का समावेश किया था. विकासशील देशों ने माइक मूर के इन प्रस्तावों का कड़ा विरोध किया था. 

हितों का टकराव

इस समय विकासशील एवं विकसित देशों के बीच मतभेद अपने शिखर पर पहुंच चुके हैं. कृषि सब्सिडी, सरकारी कंपनियों और विकासशील देशों के दर्जे को लेकर टकराव बहुत बढ़ गया है. सबसे ज़्यादा चिंता की बात तो वो प्रस्ताव है, जो वर्ष 2019 में डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने रखा था. इसमें ये प्रावधान रखा गया है कि किसी देश को ख़ुद को विकासशील देश का दर्जा देने का अधिकार ख़त्म कर दिया जाए. इस प्रस्ताव के अनुसार, जो देश G-20 और OECD (Organisation for Economic Co-operation and Development) के सदस्य हैं, या फिर जिन्हें विश्व बैंक अधिक आमदनी वाले देश मानता है, उन्हें अब विकासशील देश न माना जाए. ये प्रस्ताव लागू होने की सूरत में भारत को विकासशील देश के तौर पर जो विशेष दर्जा और ख़ास अधिकार मिलते हैं, वो नहीं मिल सकेंगे. जैसे कि समझौते लागू करने के लिए अधिक समय और विवादों के निपटारे के लिए क़ानूनी सहायता की व्यवस्था.

चयन प्रक्रिया के दौरान, आम तौर पर कोई देश खुलकर ये नहीं बताता कि वो किस उम्मीदवार के समर्थन में है. इसके बावजूद, अमेरिका, यूरोपीय संघ और कनाडा के व्यापार अधिकारियों ने कहा है कि विश्व व्यापार संगठन का नया महानिदेशक एक विकसित देश से बनना चाहिए. जबकि WTO के अफ्रीकी देशों का कहना है कि अब समय आ गया है जब उनके बीच का कोई व्यक्ति, महानिदेशक चुना जाए. पहली बार किसी महिला को महानिदेशक बनाने पर भी काफ़ी ज़ोर दिया जा रहा है. भारत ने अब तक किसी एक प्रत्याशी के पक्ष में खुलकर अपना समर्थन व्यक्त नहीं किया है. लेकिन, उसका ये ज़रूर कहना है कि वो ऐसे प्रत्याशी के पक्ष में है जो सेवाओं के वैश्विक व्यापार को बढ़ावा देने का समर्थक हो, ग़रीब देशों को खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में यक़ीन रखता हो और विकास संबंधी मुद्दों को व्यापार वार्ताओं का हिस्सा बनाने को लेकर प्रतिबद्ध हो.

भारत ने अब तक किसी एक प्रत्याशी के पक्ष में खुलकर अपना समर्थन व्यक्त नहीं किया है. लेकिन, उसका ये ज़रूर कहना है कि वो ऐसे प्रत्याशी के पक्ष में है जो सेवाओं के वैश्विक व्यापार को बढ़ावा देने का समर्थक हो, ग़रीब देशों को खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में यक़ीन रखता हो और विकास संबंधी मुद्दों को व्यापार वार्ताओं का हिस्सा बनाने को लेकर प्रतिबद्ध हो.

इस बार के चुनाव में विकसित देशों के दो प्रतिनिधि मैदान में हैं. एक तो हैं कोरिया कि यू म्युंग-ही और दूसरे हैं ब्रिटेन के लियाम फॉक्स. फॉक्स, ब्रिटेन के वाणिज्य मंत्री रह चुके हैं. और वो ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने (ब्रेग्ज़िट) के कट्टर समर्थक रहे हैं. फॉक्स के इन विचारों को देखते हुए इस बात की संभावना कम ही है कि यूरोपीय देश, उन्हें WTO महानिदेशक बनाए जाने का समर्थन करेंगे. यानी कोरिया की म्युंग-ही को ज़्यादातर विकसित देशों का समर्थन मिलने की संभावना है. म्युंग-ही कोरिया के व्यापार मंत्रालय के साथ काम कर चुकी हैं. वो एशियाई देशों के बीच मुक्त व्यापार के समझौते RCEP (Regional Comprehensive Economic Partnership) की प्रमुख वार्ताकार रही थीं. सऊदी अरब के अल-तुवैजरी, वहां के पूर्व योजना और आर्थिक मामलों के मंत्री रह चुके हैं. लेकिन अन्य प्रत्याशियों की तुलना में उन्हें व्यापार वार्ताओं का बेहद कम अनुभव है. नाइजीरिया की एनगोज़ी ओकोंजो-आइविएला की उम्मीदवारी काफ़ी मज़बूत है. वो विश्व बैंक की महानिदेशक रह चुकी हैं. और 2012 में वो बैंक की महानिदेशक का चुनाव भी लड़ चुकी हैं. लेकिन, जहां तक राजनीतिक प्रोफ़ाइल और वार्ताओं के अनुभव की बात है, तो केन्या की अमीना मोहम्मद एक मज़बूत प्रत्याशी हैं. वो संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण कार्यक्रम से जुड़ी रही हैं. विश्व व्यापार संगठन में काम करने का भी उनका व्यापक अनुभव रह चुका है. वो WTO के मंत्रियों की बैठक की पहली महिला अध्यक्ष रह चुकी हैं. उन्होंने कृषि उत्पादों के निर्यात पर सब्सिडी के विवाद में अमेरिका और चीन के बीच बातचीत में मध्यस्थता की थी. 

निष्कर्ष

हर प्रत्याशी की कमज़ोरी और उसकी ख़ूबियों के बावजूद, विश्व व्यापार संगठन के महानिदेशक के चुनाव में समय लगना तय है. अब जबकि हर देश इस बात पर विचार कर रहा है कि वो किस उम्मीदवार का समर्थन करे, तो उन्हें इस बात का ध्यान भी रखना होगा कि विश्व व्यापार संगठन के महानिदेशक कौन कौन सी ज़िम्मेदारियां निभाते हैं. वो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर WTO का प्रतिनिधित्व करते हैं, व्यापार वार्ताओं में सहयोग करते हैं, व्यापार संगठन के सचिवालय के प्रमुख होते हैं और विश्व व्यापार संगठन की व्यवस्था के संरक्षक होते हैं. कोविड-19 की महामारी ने दुनिया की व्यापारिक व्यवस्था के लिए नई चुनौतियां पेश की हैं. आज वैश्विक समुदाय के बीच दरार गहरी और चौड़ी होती जा रही है. तो, विश्व व्यापार संगठन के ऊपर अप्रासंगिक होने का ख़तरा भी मंडरा रहा है. क्योंकि, आज दुनिया मंदी के मुहाने पर खड़ी है और विश्व में बड़े पैमाने पर आर्थिक संकट चल रहा है. समय की मांग ये है कि कि WTO महानिदेशक के तौर पर ऐसे व्यक्ति का चुनाव किया जाए, जो बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था में नई जान फूंक सके. और, WTO का इस तरह से मार्गदर्शन कर सके जिससे कि विश्व में प्रगति और विकास को बढ़ावा मिले. क्योंकि, जब विश्व व्यापार संगठन का गठन किया गया था, तो दुनिया से इसी बात का वादा किया गया था.

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