कोविड-19: वैश्विक महामारी की दवा पर मानवता की क़ीमत पर एकाधिकार

अगर कोविड-19 के उपचार के लिए कोई टीका या दवा बनायी जानी है, तो क्या इस बात की संभावना है कि इस तक पहुंच बनाने के अधिकार से दुनिया के एक बड़े हिस्से को वंचित रखा जा सके? ये इस बात पर निर्भर है कि सरकार दवा के पेटेंट के नियमों में किस हद तक बदलाव के लिए तैयार है? साथ ही सरकार रिसर्च और सहयोग के नए तौर तरीक़ों को अपनाने और पुरानी बंदिशों की दीवारों को ढहाने को कितना बढ़ावा देती है?

कोविड-19 टीका, दवा वितरण, पेटेंट कानून, दवा कंपनियां, संप्रभुता, स्वास्थ्य देखभाल, सार्वजनिक स्वास्थ्य, सामरिक अध्ययन, अंतरराष्ट्रीय मामले

अमेरिका नौसेना (USNS) के मेडिकल शिप USNS कम्फर्ट के 30 मार्च 2020 को न्यूयॉर्क बंदरगाह पहुंचने की तस्वीर. ये नौसैनिक जहाज़, कोविड-19 से निपटने के लिए न्यूयॉर्क राज्य द्वारा लगाई गई तमाम संस्थाओं का एक हिस्सा है.

कॉपीराइट-न्यूयॉर्क नेशनल गार्ड/फ्लिकर (प्रतीकात्मक तस्वीर)

इस समय पूरी दुनिया कोविड-19 महामारी के ख़ात्मे के लिए दवा के बनने का इंतज़ार कर रही है. विश्व के कई देशों में इस समय कोविड-19 की वैक्सीन के क्लिनिकल ट्रायल चल रहे हैं. इसके अलावा कई देशों में दवा के परीक्षण और विकास पर भी काम चल रहा है. ताकि इस महामारी से निपटने के लिए नई दवाएं के टीके और दूसरे स्वास्थ्य संसाधन बाज़ार में उतारे जा सकें. इस संदर्भ में पूरी दुनिया में एक बहस और भी चल रही है कि, जब इस महामारी के इलाज की दवा मिल जाएगी, तो क्या इस तक पहुंच में बाधा आएगी या फिर पेटेंट के ज़रिए इसकी ख़रीद-फ़रोख़्त और उपलब्धता को सीमित किया जाएगा.

पेटेंट एक तरह के बौद्धिक संपदा के अधिकार होते हैं, जो किसी नए आविष्कार के आविष्कारक को उस वस्तु पर बीस साल का एकाधिकार प्रदान करते हैं. इस दौरान, उस नई ईजाद की गई वस्तु का पेटेंट जिसके भी पास होता है, उनके पास ही उसके निर्माण और उसे बेचने का अधिकार होता है. या फिर वो किसी अन्य संस्था को इसे बनाने का लाइसेंस देते हैं और उसके बदले में उससे रॉयल्टी या लाइसेंस शुल्क लेते हैं. किसी नई ईजाद पर पेटेंट का मक़सद ये होता है कि आविष्कारक ने उसके आविष्कार के दौरान रिसर्च व अन्य मदों में जो भी व्यय किया है उसकी क्षतिपूर्ति कर ले. पेटेंट के ज़रिए भविष्य में नई ईजाद और रिसर्च को बढ़ावा देने की बात भी कही जाती है. ये इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि बाज़ार में नई दवाएं या वैक्सीन उतारने में दवा कंपनियों को एक अरब डॉलर या इससे भी ज़्यादा की रक़म ख़र्च करनी पड़ती है.

पेटेंट एक तरह के बौद्धिक संपदा के अधिकार होते हैं, जो किसी नए आविष्कार के आविष्कारक को उस वस्तु पर बीस साल का एकाधिकार प्रदान करते हैं. इस दौरान, उस नई ईजाद की गई वस्तु का पेटेंट जिसके भी पास होता है, उनके पास ही उसके निर्माण और उसे बेचने का अधिकार होता है. या फिर वो किसी अन्य संस्था को इसे बनाने का लाइसेंस देते हैं और उसके बदले में उससे रॉयल्टी या लाइसेंस शुल्क लेते हैं

लेकिन, पेटेंट संरक्षण की मौजूदा व्यवस्था ने मुनाफ़ाखोरी और दवाओं के विकास और उनके दाम में हेरा फेरी को बढ़ावा देने का काम किया है. अक्सर इलाज की भारी क़ीमत चुकानी पड़ती है. और बड़ी दवा कंपनियां अक्सर उन्हीं बीमारियों की दवाओं के विकास के लिए रिसर्च को बढ़ावा देती हैं, जिनका प्रभाव अमीरों पर पड़ता हो. इसके अतिरिक्त, नए नए आविष्कारों को बढ़ावा देने के बजाय, दवा कंपनियों ने पेटेंट का इस्तेमाल करके सामान्य जानकारियों को भी अपने एकाधिकार के दायरे में ले लिया है. और इसे बढ़ावा देने के लिए ये दवा कंपनियां अक्सर द्वितीयक पेटेंट के दावे भी दाख़िल कर देती हैं. साथ ही ये कंपनियां जेनेरिक दवाओं के निर्माण के विरोध में लॉबीइंग करती हैं.

इसी वजह से, पेटेंट के नियमों के लिए बनी सरकार की नीतियां रिसर्च को बढ़ावा देने के साथ साथ सामाजिक लाभ और सभी वर्गों को उस वस्तु की उपलब्धता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती हैं. कोविड-19 की महामारी को देखते हुए इसकी दवा के पेटेंट के ज़रिए एकाधिकार को लेकर एक राष्ट्रीय नीति की आवश्यकता अब और बढ़ गई है. अगर, इस महामारी के इलाज के लिए कोई वैक्सीन या दवा ईजाद की जाती है, तो क्या इस बात की आशंका भी है कि पेटेंट के अधिकारों के कारण, दुनिया के तमाम क्षेत्रों को ये दवा उपलब्ध कराने की राह में बाधाएं खड़ी होंगी? इस सवाल का जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि सरकार पेटेंट के नियमों में किस हद तक बदलाव के लिए तैयार है? आख़िर प्रशासन नए रिसर्च और आपसी सहयोग व इनकी राह में आने वाली मौजूदा बाधाओं को दूर करने के लिए किस हद तक राज़ी है?

कोविड-19 की महामारी को देखते हुए इसकी दवा के पेटेंट के ज़रिए एकाधिकार को लेकर एक राष्ट्रीय नीति की आवश्यकता अब और बढ़ गई है. अगर, इस महामारी के इलाज के लिए कोई वैक्सीन या दवा ईजाद की जाती है, तो क्या इस बात की आशंका भी है कि पेटेंट के अधिकारों के कारण, दुनिया के तमाम क्षेत्रों को ये दवा उपलब्ध कराने की राह में बाधाएं खड़ी होंगी?

फिगर-1:दुनिया के किन देशों में कोविड-19 की वैक्सीन के विकास का काम चल रहा है

स्रोत:गावी द वैक्सीन एलायंस

इन चिंताओं को दूर करने के लिए उचित क़दम उठाने की ज़िम्मेदारी विकसित देशों की बनती है. क्योंकि, कोविड-19 की वैक्सीन और एंटी वायरल दवा ईजाद करने की रेस में इस समय विकसित देशों की संस्थाएं ही सबसे आगे चल रही हैं. ख़ास तौर से वैक्सीन के संदर्भ में रेखा चित्र-1 इस बात की जानकारी देता है कि दुनिया भर में कौन से संस्थान और कंपनियां इन्हें विकसित करने के काम में जुटी हैं. वहीं, दूसरे रेखा चित्र में वैक्सीन के विकास में लगे देशों के बारे में बताया है और इसी के साथ उनका सरकारी, औद्योगिक व निजी और अलाभकारी संगठनों में वर्गीकरण भी किया है. इस समय कोविड-19 की वैक्सीन विकसित करने पर सबसे ज़्यादा रिसर्च उत्तरी अमेरिका में हो रही है. इनमें से 70 प्रतिशत रिसर्च औद्योगिक या निजी कंपनियों में हो रही हैं. एक नई वैक्सीन के विकास के संसाधनों, विशेषज्ञता और आधुनिक उपकरणों की बात करें, तो ये ज़्यादातर विकसित देशों में ही उपलब्ध हैं. इसलिए इस बात की संभावना अधिक है कि कोविड-19 का इलाज पहले विकसित देशों में ही खोजा जाएगा.

फिगर-2 कोविड-19 की वैक्सीन के विकास में जुटी संस्थाएं, उनके क्षेत्र और प्रकार

स्रोत: Nature, Ewen Callaway

हालांकि, अमेरिका जैसे देश और बहु-राष्ट्रीय दवा कंपनियां, इस महामारी का इलाज खोजने के अभियान में सहयोग करने और सबको दवा और टीका उपलब्ध कराने की मांग का विरोध करते रहे हैं. मिसाल के तौर पर, इसके लिए एक सुझाव ये दिया गया था कि दवाओं और वैक्सीन के निर्माण को बढ़ावा देने के लिए एक पेटेंट समूह बना दिया जाए. ये एक ऐसी व्यवस्था है, जो इसके मालिकों और आविष्कारको को ये अधिकार देती है कि वो अपनी दवा और वैक्सीन के साथ जुड़े पेटेंट को इकट्ठा करने और उनके लाइसेंस को बढ़ावा देती है. इससे विकासशील देशों के लिए दवा तक पहुंच बनाना आसान होगा. इसकी लागत भी उन्हें कम पड़ेगी. 2005 में सार्स वायरस के प्रकोप को लेकर हुए अध्ययन के दौरान, ये माना गया था कि पेटेंट समूह बनाने से वैक्सीन के विकास और उन्हें सबको उपलब्ध कराने में काफ़ी मदद मिल सकती है. संयुक्त राष्ट्र द्वारा समर्थित, मेडिसिन्स पेटेंट पूल (MPP) के अंतर्गत ये व्यवस्था मौजूद भी है. ये व्यवस्था, कम और मध्यम आमदनी वाले देशों में जीवन रक्षक दवाओं की उपलब्धा बढ़ाने में मदद करती है.

इसका नतीजा ये हुआ कि मई 2020 में यूरोपीय संघ के नेतृत्व में विश्व स्वास्थ्य संगठन में एक प्रस्ताव लाया गया था. इसका समर्थन भारत और ब्रिटेन ने भी किया था. इस प्रस्ताव में ये प्रतिबद्धता जताई गई थी कि दवाओं, वैक्सीन और मेडिकल उपकरण उपलब्ध कराने के मामले में पूरी दुनिया एकजुट होकर अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देगी. इस प्रस्ताव में आपसी सहयोग बढ़ाने के जिन तरीक़ो का ज़िक्र किया गया है, उनमें स्वैच्छिक पेटेंट पूल बनाने और मौजूदा व्यापार नियमों का इस्तेमाल करके दवाओं और टीके का उत्पादन और वितरण  बढ़ाने का हवाला दिया गया है. हालांकि, अमेरिका ने एक बयान जारी करके इस प्रस्ताव की आलोचना की और ख़ुद को इस प्रस्ताव से अलग कर लिया था. अमेरिका का तर्क ये था कि लंबी वार्ता के बाद जिन व्यापार नियमों पर सहमति बनी थी, उन्हें इस प्रस्ताव में शामिल नहीं किया गया है. ऐसे में इस महामारी की दवा ईजाद करने के लिए रिसर्च को जारी रखने और इसे बढ़ावा देने में अमेरिका को मुश्किल होगी. बड़ी दवा कंपनियों जैसे कि फाइज़र (Pfizer), और ग्लैक्सो स्मिथक्लाइन (GSK) ने भी ऐसे प्रस्तावों का विरोध किया था. फ़ाइज़र ने तो कोविड-19 के इलाज पर रिसर्च में सहयोग के प्रस्ताव को बेहद ‘ख़तरनाक’ बताया था.

अमेरिका और अमेरिकी कंपनियों का ये रुख़ बहुत परेशान करने वाली बात है. क्योंकि, इस समय कोविड-19 महामारी के इलाज की दवा और इसकी वैक्सीन पर सबसे ज़्यादा काम अमेरिका में ही हो रहा है. ये चिंता की बात क्यों है, इसे समझने के लिए हमें ज़्यादा पीछे जाने की भी ज़रूरत नहीं. HIV/एड्स की बीमारी के प्रकोप के बाद के दौर को देख लीजिए. इस बीमारी के इलाज के लिए इतनी भारी क़ीमत चुकानी पड़ती है कि, बहुत से लोगों की तो ज़िंदगी ही दांव पर लग जाती है. एचआईवी एड्स की बीमारी का प्रकोप जब अपने शिखर पर था, तो इसके इलाज के लिए तीन स्तर वाली एंटी रेट्रोवायरल का ख़र्च क़रीब दस हज़ार डॉलर आता था. उस समय, एड्स के इलाज की इतनी क़ीमत को ‘भयंकर असमानता और बहुत बड़ा सदमा’ कहा गया था. और इन दवाओं की भारी क़ीमत और सामान्य लोगों तक उनकी पहुंच न हो पाने के लिए पश्चिमी देशों की दवा कंपनियों को ज़िम्मेदार ठहराया गया था. क्योंकि एड्स के इलाज की दवाओं के पेटेंट उन्हीं के पास थे. किसी मर्ज़ के इलाज की दवाओं पर एकाधिकार के कितने बुरे नतीजे हो सकते हैं, इसकी एक मिसाल हम और पास, अपने देश में ही देख सकते हैं. भारत में क़रीब एक लाख, 27 हज़ार नवजात शिशु हर साल न्यूमोनिया से मर जाते हैं. हालांकि, फाइज़र कंपनी की न्यूमोनिया की वैक्सीन सब्सिडी पर दी जाती है. फिर भी ये इतनी महंगी है कि इसका ख़र्च उठा पाना बहुत से लोगों के बस के बाहर है.

अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत संसाधनों का आवंटन और उन पर मालिकाना हक़ के पारंपरिक नियम, संप्रभुता पर आधारित हैं. किसी देश के संसाधनों और वहां पाए जाने वाले नमूनों पर संबंधित देशों के संप्रभु अधिकार होते हैं. यही पारंपरिक सिद्धांत, हर देश में बनायी जाने वाली दवाओं और टीकों पर भी लागू होता है. इसी वजह से 2009 के H1N1 महामारी के दौरान हमने देखा था कि इसके इलाज की दवाओं और वैक्सीन के उत्पादन और उनकी आपूर्ति पर विकसित देशों का एकाधिकार होता था. और विकासशील देशों की चुनौतियों और ज़रूरतों को कैसे पूरा करना है (या नहीं करना है), इसका फ़ैसला इन्हीं अमीर देशों के हाथ में होता था. वो मानवता के आधार पर ये फ़ैसला बिल्कुल नहीं करते थे. H1N1 महामारी के दौरान कनाडा ने इसकी वैक्सीन को दान का वादा करने से इनकार कर दिया था. वहीं, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने इस महामारी की दवा और वैक्सीन बनाने वाली अपनी कंपनियों को आदेश दिया था कि वो पहले अपने देश की ज़रूरतें पूरी करें. इसके बाद ही वो अन्य देशों के साथ किए गए दवा की आपूर्ति के वादे को पूरा कर सकती हैं. अमीर मुल्कों के इन फ़ैसलों से विकासशील देशों को सही समय पर वैक्सीन और दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित कर पाने में बहुत मुश्किलें पेश आई थीं. विकसित देशों द्वारा दवाओं और टीकों की भारी तादाद जमा करने और अपने देश की घरेलू आवश्यकताओं को पूरा करने को प्राथमिकता देने के कारण, विकासशील देशों को अपनी जनता तक इस बीमारी का इलाज उपलब्ध कराने में काफ़ी इंतज़ार करना पड़ा था.

दुनिया में वैक्सीन और दवाओं के वितरण की मौजूदा व्यवस्था अस्थायी है. और हालात पैदा होने के बाद ही प्रतिक्रिया देती है. इसके अलावा इन दवाओं की आपूर्ति के समझौते बाध्यकारी नहीं होते. हर देश अपने हिसाब से इस बारे में फ़ैसला करने को स्वतंत्र होता है. यहां अस्थायी व्यवस्था से हमारा मतलब ये है कि, दो देश आपसी समझौते से दवा या आवश्यक टीकों का लेन देन कर लेते हैं. इसके अलावा विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा टीके की व्यवस्था और सरकार व निजी कंपनियों के बीच क़रार जैसे कि GAVI गठबंधन और क्लिंटन ग्लोबल इनिशिएटिव के ज़रिए भी दवाएं और वैक्सीन, विकासशील देशों को उपलब्ध कराई जाती हैं. हम यहां इन व्यवस्थाओं की आलोचना नहीं कर रहे हैं. लेकिन, अगर कोई देश दवाएं और टीके उपलब्ध कराने की ऐसी किसी व्यवस्था में भागीदार है, तो ये मान लिया जाता है कि वो मानवता के सामने खड़ी चुनौतियों से निपटने में अपने हिस्से का पर्याप्त योगदान कर रहा है. वो एक ज़िम्मेदार वैश्विक राष्ट्र के तौर पर बहुत सही क़दम उठा रहा है. और इसका नतीजा ये होता है कि दवाओं और वैक्सीन की समान उपलब्धता के क़ानूनी और बाध्यकारी समझौतों को लेकर वास्तविक परिचर्चा हाशिए पर धकेल दी जाती है.

H1N1 महामारी के दौरान कनाडा ने इसकी वैक्सीन को दान का वादा करने से इनकार कर दिया था. वहीं, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने इस महामारी की दवा और वैक्सीन बनाने वाली अपनी कंपनियों को आदेश दिया था कि वो पहले अपने देश की ज़रूरतें पूरी करें. इसके बाद ही वो अन्य देशों के साथ किए गए दवा की आपूर्ति के वादे को पूरा कर सकती हैं

हालांकि, दुनिया ने कोविड-19 महामारी से निपटने के लिए जैसा रुख़ दिखाया है, वो वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय द्वारा आमतौर पर किए जाने वाले बर्ताव से ठीक उलट है. आज ये माना जा रहा है कि सूचना, रिसर्च और आंकड़ों के मुक्त प्रवाह से इंसान इस महामारी के इलाज को जल्द से जल्द तलाश लेगा. ऐसी तमाम कोशिशों को रफ़्तार देने के लिए, दुनिया भर के वैज्ञानिक आगे आकर अपनी जानकारी और रिसर्च के नतीजे अन्य लोगों से खुलकर साझा कर रहे हैं. कई मशहूर वैज्ञानिक पत्रिकाओं ने इस विषय में हो रहे सभी अनुसंधानों को वर्गीकृत करके प्रकाशित किया है. ये जानकारी दुनिया के किसी भी देश के वैज्ञानिक इस्तेमाल कर सकते हैं. वैज्ञानिक और संस्थाओं ने आगे आकर ये ‘मुक्त कोविड प्रतिज्ञा’ की है. जिससे उनकी बौद्धिक संपदा का दुनिया में कोई भी इस्तेमाल कर सकता है. और जैसा कि वैज्ञानिक पत्रिका लैंसेट (Lancet) का ये लेख कहता है, ‘वैज्ञानिक सीमाओं को खोल दिया गया है. सूचनाओं के मुक्त प्रवाह की राह की बाधाओं को हटा लिया गया है … इससे वैज्ञानिक सहयोग के एक नए युग का आग़ाज़ हुआ है. लोग आज खुलकर इस विषय पर किसी भी नए उत्पाद की कार्यकुशलता को लेकर परिचर्चा कर रहे हैं.’

वहीं दूसरी ओर, इस महामारी के दौरान तमाम देशों के बर्ताव ने निराश किया है. दुनिया के कई बड़े नेताओं और मशहूर हस्तियों ने एक खुले ख़त में अपील की है कि कोविड-19 महामारी का कोई भी टीका पेटेंट की पाबंदियों से आज़ाद होना चाहिए. इसका उत्पादन बड़े पैमाने पर करके दुनिया के हर इंसान को मुफ़्त उपलब्ध कराया जाना चाहिए. कोविड-19 की महामारी को पहले ही ‘असमानता वाला मर्ज़’ कहा जा रहा है. क्योंकि ये बीमारी दुनिया भर के लोगों में आमदनी, संपत्ति और अवसरों के हिसाब से भेदभाव करती दिखाई दे रही है. अगर इसके इलाज की वैक्सीन को हर देश और हर नागरिक को समान रूप से उपलब्ध नहीं कराया गया, या इसकी गारंटी नहीं दी गई. तो, बीमारी के शिकार लोगों के बीच ये असमानता और बढ़ जाएगी. आज पूरी दुनिया ये मान रही है कि मानवता की सेहत के सामने खड़ी इस विशाल और आपातकालीन चुनौती से निपटने के लिए आज विश्व स्तर पर सहयोग की ज़रूरत है. ताकि इस महामारी के इलाज की दवाओं और वैक्सीन का निर्माण और उत्पादन ज़्यादा से ज़्यादा देशों में हो सके. अब इस दिशा में मिलकर काम करने के लिए आम सहमति बनाने को लेकर वार्ताओं की ज़रूरत है. ताकि, दुनिया के हर व्यक्ति को इस बीमारी की दवा मुहैया कराई जा सके. तभी ये सुनिश्चित किया जा सकेगा कि जिस तरह इस महामारी ने लोगों को असमान रूप से प्रभावित किया है, वैसा ही इसके इलाज के साथ न हो. और जिस तरह इस महामारी ने दुनिया के कमज़ोर तबक़ों पर क़हर ढाया है, वैसे ही ये लोग दवाओं से भी महरूम न रह जाएं.

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