कोविड-19: निर्यात पर प्रतिबंध, व्यापार के नियम और अंतरराष्ट्रीय सहयोग

विश्व व्यापार संगठन के नियम महामारी से परे नहीं हैं. यही कारण है कि महामारी के कारण वैश्विक व्यापार एवं वाणिज्य के क्षेत्र में जो उथल-पुथल हो रही है, उससे निपटने में ये नियम नाकाफ़ी साबित हुए हैं.

कोविड-19 महामारी के संकट के बाद पूरी दुनिया में दवाओं, मेडिकल उपकरणों और निजी सुरक्षा उपकरणों की मांग में बहुत वृद्धि देखी जा रही है. इसके अलावा महंगाई को रोकने व हर नागरिक के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त मात्रा में अनाज का भंडारण करना हर देश की पहली प्राथमिकता बन गया है. लेकिन, सख़्ती से लागू किए गए लॉकडाउन और अंतरराष्ट्रीय परिवहन में लगी पाबंदियों के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित हो गई हैं. इसी कारण से बहुत से देशों में ज़रूरी सामानों की भारी कमी होने का अंदेशा है. इन परिस्थितियों को देखते हुए बहुत से देशों और व्यापारिक समूहों ने निर्यात पर तरह तरह के प्रतिबंध लगा दिए हैं. ताकि ज़रूरी सामान की अपनी घरेलू आपूर्ति को अबाध बनाए रखें और अपने अपने यहां इन सामानों की क़ीमतों को स्थिर रख सकें.

23 अप्रैल 2020 को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा था कि कम से कम 80 देशों ने अपने यहां से सामान के निर्यात पर या तो प्रतिबंध लगा दिया है या उनका निर्यात सीमित कर दिया है, ताकि ज़रूरी सामान की कमी ख़ुद उनके यहां न हो. नीचे उल्लिखित सारणी में इन देशों द्वारा जिन सामान पर प्रतिबंध लगाए गए हैं, उनका ज़िक्र है. जैसे कि फेस मास्क, दस्ताने और खाने पीने के सामान. इसमें से अगर कुछ मिसालों पर ज़ोर दें, तो मार्च 2020 में यूरोपीय संघ ने सुरक्षात्मक उपकरण के निर्यात से पहले रज़ामंदी लेने को ज़रूरी बना दिया था. इसी तरह यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन ने कुछ ख़ास खाद्य पदार्थों और मेडिकल सामान जैसे कि कीटनाशकों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिए थे. इसी तरह अमेरिका, भारत और ब्रिटेन ने अपने यहां से प्रोटेक्टिव गियर, डायग्नोस्टिक टेस्ट किट और दवाओं के निर्यात पर पाबंदियां लगा दी थीं. रूस और कज़ाख़िस्तान जैसे देशों ने गेहूं और आटे के निर्यात पर रोक लगा दी थी. ये ऐसे क़दम हैं जिनसे आयात पर निर्भर देशों जैसे कि बांग्लादेश के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं. इसी तरह वियतनाम ने चावल के निर्यात को सीमित कर दिया था. हालांकि इस बात के संकेत हैं कि वियतनाम अपने यहां से चावल के निर्यात पर लगी पाबंदियां हटा लेगा. क्योंकि उसकी घरेलू मांग भर के लिए आपूर्ति पर्याप्त हो गई है.

इस मोड़ पर सबसे अहम सवाल ये है कि तमाम देशों द्वारा सामानों के निर्यात पर लगाए गए ये प्रतिबंध क्या विश्व व्यापार संगठन के समझौतों के तहत तय व्यापारिक उत्तरदायित्व के दायरे में आते हैं?

सारणी-1:कोविड-19 के कारण तमाम देशों और कस्टम क्षेत्रों द्वारा उत्पाद के वर्गीकरण के अनुसार निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंध

इस मोड़ पर सबसे अहम सवाल ये है कि तमाम देशों द्वारा सामानों के निर्यात पर लगाए गए ये प्रतिबंध क्या विश्व व्यापार संगठन के समझौतों के तहत तय व्यापारिक उत्तरदायित्व के दायरे में आते हैं? इस सवाल का जवाब सावधानी पूर्वक दिया जाए तो हां होगा. नीचे उल्लिखित सारणी उन नियमों और प्रतिबंधों में छूट का ज़िक्र करती है, जिनके तहत तमाम देश कोविड-19 के कारण पैदा हुई परिस्थिति में सीमित समय के लिए ये प्रतिबंध लगा सकते हैं. हालांकि, अगर हम इन नियमों और इनसे मिलने वाली छूट को बारीक़ी से देखें, तो इसकी अलग अलग व्याख्या हो सकती है कि किन हालात में ऐसे प्रतिबंध लगाने वाले असाधारण क़दम उठाए जा सकते हैं.

उदाहरण के तौर पर अपने यहां ज़रूरी उत्पादों की भयंकर कमी होने के कारण कोई भी देश इन्हें दूसरे देशों को निर्यात करने पर प्रतिबंध लगा सकता है. कोई भी ये तर्क दे सकता है कि ‘भयंकर कमी’ के हालात की पहले समीक्षा की जानी चाहिए. उसके बाद ही निर्यात पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं. अन्यथा तो कोई भी देश किसी सामान की कमी की आशंका को देखते हुए ही पाबंदियां लगा देगा. भले ही आगे चल कर उस उत्पाद की कमी हो या न हो. लेकिन, इस कारण से ऐसे महत्वपूर्ण संसाधनों की जमाखोरी हो सकती है, जो व्यापार के नियमों के ख़िलाफ़ है. ये ठीक उसी तरह है, जैसे कि आम लोगों ने देश भर में लॉकडाउन लागू होने की घोषणा के बाद, आने वाले हालात की आशंका से ही घबराहट में ज़रूरत से ज़्यादा सामान ख़रीद कर घर में जमा कर लिया था.

टेबल 1:कोविड-19 के हालात में निर्यात पर प्रतिबंध के लिए विश्व व्यापार संगठन के कौन से नियम लागू हो सकते हैं

विश्व व्यापार संगठन समझौता लागू नियम
जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ ऐंड ट्रेड 1994(GATT)

ज़रूरी सामान की छूट कब

GATT की धारा 11 निर्यात पर प्रतिबंध और सीमा निर्धारित करने की इजाज़त देती है हालांकि कोई भी सदस्य तभी ये प्रतिबंध लगा सकता है जब उसके यहां खाद्य पदार्थ या अन्य ज़रूरी सामान की अस्थायी कमी का अंदेशा हो

स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए आवश्यक क़दम

समझौते की धारा 20 इंसानों की ज़िंदगी और स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए प्रतिबंध और पाबंदियां लगाने के नियम तय करते हैं

राष्ट्रीय सुरक्षा

धारा 21 सदस्य देशों को ये अधिकार देती है कि वो अपने आवश्यक सुरक्षा हितों के संरण के लिए सभी ज़रूरी क़दम उठा सकते हैं. ऐसा वो युद्ध या अंतरराष्ट्रीय संबंधों के आपातकाल के दौरान कर सकते हैं.

कृषि पर समझौता

खाद्य पदार्थों की कमी

समझौते की धारा 12 सदस्य देशों को ये इजाज़त देती है कि वो निर्यात पर अस्थायी प्रतिबंध और सीमाएं तय कर सकते हैं. पर शर्त ये है कि उनके यहां खाद्य पदार्थ की भारी कमी हो गई हो. हालांकि ये प्रतिबंध लगाने और निर्यात की सीमाएं तय करने से पहले सदस्य देशों को उन देशों की खाद्य सुरक्षा का भी ध्यान रखना होगा जो उसके यहां से ज़रूरी खाद्य पदार्थों के आयात पर निर्भर हैं.

स्रोत: लेखक के अपने

लेकिन, क्या सभी देशों के लिए ये उचित होगा कि वो ज़रूरी सामानों की भारी किल्लत होने का इंतज़ार करें और उसके बाद निर्यात पर प्रतिबंध लगाएं? ऐसी परिस्थिति में विश्व व्यापार संगठन के सदस्य ऐसी दुविधा में फंस जाते हैं, जिससे पार पाना उनके लिए असंभव हो जाता है. वायरस के संक्रमण का पहले से आकलन कर पाना संभव नहीं है. इसके अलावा अन्य देशों द्वारा अपने अपने यहां से निर्यात पर लगाई गई पाबंदियों के चलते कोई भी देश इस बात के लिए मजबूर हो जाता है कि वो अपने यहां ज़रूरी सामानों की उपलब्धता को सुनिश्चित करे. इसके अतिरिक्त, चूंकि ऐसे प्रश्नों को विश्व व्यापार संगठन के सामने व्याख्या अथवा स्पष्टीकरण के लिए नहीं लाया गया है. तो, ये बात बिल्कुल साफ़ नहीं है कि किसी महामारी की स्थिति में विश्व व्यापार संगठन के समझौते किस तरह से लागू होंगे. और क्या सदस्य देशों के पास इतनी वित्तीय और राजनीतिक इच्छाशक्ति होगी कि वो विश्व व्यापार संगठन के समक्ष इन समझौतों से पैदा हुए विवादों के स्पष्टीकरण को लेकर विवाद खड़ा करें. वो भी एक महामारी के समय. अभी ऐसी कोई मिसाल देखने को नहीं मिली है.

विश्व व्यापार संगठन के समझौतों के अंतर्गत आने वाले सभी वचनों और प्रतिबद्धताओं के अनुसार सभी देशों को अपने यहां से सामानों के निर्यात पर पाबंदी लगाने से पहले विश्व व्यापार संगठन को इसकी पूर्व सूचना देनी होती है

एक और प्रमुख समस्या, इस संकट के एक और आयाम को लेकर है. और वो ये है कि तमाम देशों ने निर्यात पर ये प्रतिबंध बिना पर्याप्त नोटिस दिए और सूचना प्रकाशित किए हुए लगा दिए थे. विश्व व्यापार संगठन के समझौतों के अंतर्गत आने वाले सभी वचनों और प्रतिबद्धताओं के अनुसार सभी देशों को अपने यहां से सामानों के निर्यात पर पाबंदी लगाने से पहले विश्व व्यापार संगठन को इसकी पूर्व सूचना देनी होती है. जैसे कि 2012 का एक फ़ैसला और ट्रेड फैसिलिटेशन का समझौता. अप्रैल महीने के आख़िरी हफ़्ते तक जिन अस्सी देशों ने अपने यहां से उत्पादों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाए हैं, उनमें से केवल 39 ने इसकी सूचना विश्व व्यापार संगठन व अन्य सदस्य देशों को दी है. ऐसे में पारदर्शिता की कमी के चलते इस बात का पता लगाना क़रीब क़रीब असंभव हो गया है कि निर्यात पर लगी इन पाबंदियों से विश्व व्यापार में किस तरह के परिवर्तन आ रहे हैं और इनका किस तरह का प्रभाव पड़ रहा है. साथ ही साथ जानकारी के अभाव में जो देश आयात के भरोसे हैं उनके लिए अपने यहां ज़रूरी सामानों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की योजना बनाना और अन्य स्रोतों से संसाधन जुटा पाना मुश्किल हो रहा है.

मेडिकल उपकरण, व खाद्य पदार्थों के साथ अन्य ज़रूरी सामानों के निर्यात पर सीमित समय के लिए तो प्रतिबंध लगाने का फ़ैसला तो उचित लगता है. ताकि हर देश अपनी घरेलू ज़रूरतों को उचित दर पर पूरा कर सके. लेकिन, अर्थशास्त्री इस बात को लेकर चिंतित हैं कि समानों के निर्यात पर अगर ये प्रतिबंध लंबे समय तक लगे रहते हैं. तो, इससे पूरी दुनिया में ज़रूरी सामान की आपूर्ति बाधित होगी. और इससे उन देशों को सबसे अधिक क्षति पहुंचेगी, जो आयात के भरोसे रहते हैं. इन प्रतिबंधों के चलते निर्यातकों को भी नुक़सान होगा. साथ ही कम क़ीमतों के चलते उत्पादन की कार्यकुशलता पर भी बुरा असर होगा. आगे चलकर ये प्रतिबंध अवैध व्यापार और तस्करी को बढ़ावा देने का काम कर सकते हैं.

लेबनान के प्रधानमंत्री हसन दियाब ने ज़ोर देकर ये कहा था कि लेबनान, अपनी खाद्य सुरक्षा के लिए गेहूं और इसके उत्पादों के आयात पर निर्भर है. लेकिन, रूस द्वारा गेहूं के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण, लेबनान में खाद्य संकट पैदा हो सकता है

यहां पर व्यापार के अर्थशास्त्र के नियम लागू नहीं होते हैं. निर्यात पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों के चलते आगे चलकर बड़े मानवीय संकट के उत्पन्न होने की आशंका से मुंह नहीं फेरा जा सकता है. अपनी सभी दवाओं और मेडिकल उपकरणों का आयात करने वाला अफ्रीकी सहारा के देश, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आने वाली इस बाधा से सबसे बुरी तरह से प्रभावित होंगे. दवाओं और अन्य मेडिकल सप्लाई के निर्यात पर प्रतिबंध के अतिरिक्त, कई देशों ने निर्यात की ये पाबंदियां खाद्य पदार्थों पर भी लगा दी हैं. हाल ही में लेबनान के प्रधानमंत्री हसन दियाब ने ज़ोर देकर ये कहा था कि लेबनान, अपनी खाद्य सुरक्षा के लिए गेहूं और इसके उत्पादों के आयात पर निर्भर है. लेकिन, रूस द्वारा गेहूं के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण, लेबनान में खाद्य संकट पैदा हो सकता है. और इसके कारण बड़े पैमाने पर भुखमरी और लोगों के पलायन का अंदेशा है.

निर्यात पर प्रतिबंध और उन्हें सीमित करने से सामरिक गठबंधनों पर भी बुरा प्रभाव पड़ सकता है. इससे मौजूदा साझेदारी वाले सदस्य देशों के बीच अविश्वास का संकट पैदा होने का भी ख़तरा है. यूरोपीय संघ के सदस्य देशों, जैसे कि फ्रांस, जर्मनी और चेक गणराज्य ने कुछ ख़ास तरह के सुरक्षात्मक उपकरणों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिए हैं. यहां तक कि यूरोपीय संघ के अन्य सदस्य देशों को भी इनका निर्यात नहीं किया जा सकता है. जिस समय यूरोपीय आयोग इस महामारी से लड़ने में संगठित होने का आह्वान कर रहा था और ये कह रहा था कि संकट के इस समय सभी देशों के बीच एकजुटता बेहद आवश्यक है. ठीक उसी समय ये सदस्य देश दूसरे देशों को ज़रूरी सामान के निर्यात पर प्रतिबंध लगा रहे थे. ख़ुद भारत को हाइड्रॉक्सी क्लोरोक्वीन (HCQ) दवा के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का फ़ैसला उस समय पलटना पड़ा जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर पलटवार की धमकी दी. हाइड्रॉक्सी क्लोरोक्वीन दवा के बारे में कहा जा रहा है कि ये कोविड-19 के इलाज में कारगर साबित हो सकती है.  वहीं दूसरी ओर, चीन और भारत ने दुनिया के अन्य देशों को जिस तरह से बेहद ज़रूरी मेडिकल सामानों की आपूर्ति की है, उससे मेडिकल कूटनीति के फ़ायदे उनके लिए स्पष्ट हो गए हैं.

ख़ुद भारत को हाइड्रॉक्सी क्लोरोक्वीन (HCQ) दवा के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का फ़ैसला उस समय पलटना पड़ा जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर पलटवार की धमकी दी.

इन सबके बावजूद, ये कहा जा सकता है कि विश्व व्यापार संगठन के नियम महामारी से पहरे नहीं हैं. और ये नियम महामारी के कारण विश्व व्यापार और वाणिज्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव का सामना करने में असफल साबित हुए हैं. कोविड-19 महामारी के कारण पैदा हुआ आपातकाल जैसे हालात ने अंतरराष्ट्रीय नियमों और समझौतों का पालन करने की तमाम देशों की राजनीतिक इच्छाशक्ति को भी कमज़ोर किया है. हालांकि, संकट के इस दौर में भी कई देशों ने आगे आकर ये भरोसा दिया है कि वो वैश्विक व्यापार को मुक्त बनाए रहने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

मार्च 2020 में G-20 देशों के व्यापार और निवेश के मंत्री इस बात पर सहमत हुए थे कि, ‘कोविड-19 से पैदा हुए हालात से निपटने के लिए जो भी ज़रूरी आपातकालीन उपाय हों वो किए जाने चाहिए. ये उपाय लक्ष्य आधारित, पारदर्शी, अस्थायी और संकट के समानुपात में होंगे. साथ ही साथ ये सुनिश्चित किया जाएगा कि इन उपायों की वजह से व्यापार अथवा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में ग़ैर ज़रूरी बाधाएं न उत्पन्न हों. साथ ही साथ ये भी सुनिश्चित किया जाएगा कि सदस्य देशों द्वारा महामारी से निपटने के लिए उठाए गए गए आपातकालीन क़दम, विश्व व्यापार संगठन के नियमों के दायरे में हों.’ 15 अप्रैल 2020 को न्यूज़ीलैंड और सिंगापुर ‘कोविड-19 से लड़ने के लिए ज़रूरी सामानों के व्यापार की घोषणा’ करने पर सहमत हुए थे. वहीं, अप्रैल 2020 में विश्व व्यापार संगठन के 26 सदस्य देशों ने इस वचन को दोहराया कि, ‘वो कृषि उत्पादों के निर्यात पर प्रतिबंध नहीं लगाएंगे.’ साथ ही ये सदस्य देश इस बार पर भी सहमत हुए कि, ‘कोविड-19 से उत्पन्न हुई परिस्थिति से निपटने के लिए कृषि और कृषि आधारित खाद्य उत्पादों की आपूर्ति के लिए जो आपातकालीन क़दम उठाएंगे वो लक्ष्य आधारित, संकट के समानुतापत में, पारदर्शी और अस्थायी होंगे.’

फिर भी, ज़्यादातर देश अपनी राष्ट्रीय परिस्थितियों और सामरिक हितों के हिसाब से निर्यात पर इस तरह से पाबंदियां लगा रहे हैं. ताकि, ख़ुद उनके यहां ज़रूरी सामानों की आपूर्ति श्रृंखला में कोई बाधा न खड़ी हो. साथ ही साथ, वो इस बात का भी ध्यान रख रहे हैं कि उनके अन्य प्रमुख व्यापारिक साझीदार देश उनके प्रतिबंधों के प्रति उत्तर में ख़ुद अपने यहां से आवश्यक संसाधनों के निर्यात पर प्रतिबंध न लगा दें. इस महामारी के दौरान वैश्विक नेतृत्व के अभाव और वैश्विक संगठनों में अविश्वास के चलते इस संकट से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग स्थापित करने का अभाव साफ़ देखने को मिल रहा है. इस महामारी के कारण उत्पन्न हुआ स्वास्थ्य का संकट उन देशों के लिए और मुश्किलें खड़ी कर सकता है, जो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के भरोसे हैं. ऐसे में ये बेहद आवश्यक है कि दुनिया के तमाम देश इस मोर्चे पर आपसी सहयोग कायम करें. व्यापार में पारदर्शिता स्थापित करें और अपने प्रमुख व्यापारिक सहयोगी देशों के साथ संवाद स्थापित करें. ताकि इस संकट के ऐसे समाधान खोजे जा सकें, जो सभी देशों का भला कर सकें.

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