कोविड-19 काल में भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य कूटनीति

जिस वक़्त ज़्यादातर देश ज़रूरी सामानों के निर्यात पर रोक लगा रहे थे या महामारी की आड़ में मुनाफ़ा कमाने में लगे थे, भारत ने अपने हितों से आगे बढ़कर काम किया.

कोविड-19 की वजह से लोगों की जान और आजीविका के भारी नुक़सान से जूझने के बावजूद भारत की वैश्विक पहुंच सक्रिय और ख़ास रही है. जैसे ही विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 11 मार्च 2020 को कोविड-19 संक्रमण को ‘महामारी’ घोषित किया, भारत ने बिना कोई मौक़ा गंवाते हुए दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) के सदस्य देशों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस आयोजित कर इस त्रासदी से निपटने में क्षेत्रीय तैयारी का संयोजन किया. भारत ने एक स्वैच्छिक आपात कोष में 10 मिलियन अमेरिकी डॉलर की पेशकश की जिसका इस्तेमाल ज़रूरत के समय SAARC के देश करेंगे. कुल मिलाकर सदस्य देशों ने इस कोष में 26.1 मिलियन अमेरिकी डॉलर जुटाए. भारत ने आगे भी इसे बरकरार रखते हुए अंतर्राष्ट्रीय नीति संयोजन और भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए कई वर्चुअल बैठकों में हिस्सा लिया. एक बैठक हिंद-प्रशांत महासागर के देशों के साथ 20 मार्च को हुई, एक और बैठक 26 मार्च को जी-20 के सदस्य देशों के साथ और अप्रैल में BRICS देशों के विदेश मंत्रियों के साथ बातचीत हुई.

SAARC के देशों में भारत ने 15.7 करोड़ रुपये के सामान की सप्लाई की है. इनमें मेडिकल सहायता (11.71 करोड़ रुपये), सूचनाओं के आदान-प्रदान का कार्यक्रम (0.41 करोड़ रुपये) और मालदीव को खाद्य सामानों की सप्लाई (3.58 करोड़ रुपये) के रूप में ये मदद शामिल हैं.

कोविड-19 के इस समय में भारत की वैश्विक पहुंच का एक ख़ास हिस्सा रही उसकी मेडिकल कूटनीति. महामारी के ख़िलाफ़ वैश्विक लड़ाई में दवाइयों और मेडिकल के दूसरे सामानों की महत्वपूर्ण भूमिका है और इन्हें मुहैया कराने में भारत को बड़ा देश माना जाता है. 3 जून तक सिर्फ़ SAARC के देशों में भारत ने 15.7 करोड़ रुपये के सामान की सप्लाई की है. इनमें मेडिकल सहायता (11.71 करोड़ रुपये), सूचनाओं के आदान-प्रदान का कार्यक्रम (0.41 करोड़ रुपये) और मालदीव को खाद्य सामानों की सप्लाई (3.58 करोड़ रुपये) के रूप में ये मदद शामिल हैं.

पड़ोस के देशों के अलावा भारत ने दूसरे देशों को भी 32 करोड़ रुपये की मदद पहुंचाई है (इसमें 9.7 करोड़ रुपये की परिवहन लागत शामिल है). ये मदद 3 जून तक किए गए वादे का 72 प्रतिशत है. इसके अलावा म्यांमार, लैटिन अमेरिका और कैरेबियन देशों (LAC) और अफ्रीका महादेश के 12 देशों को दवा, टेस्टिंग किट और दूसरी मेडिकल सहायता के रूप में सप्लाई के लिए क़रीब 60 करोड़ रुपये का प्रॉक्यूरमेंट ऑर्डर भी जारी किया गया है.

मदद के रूप में जो दवाएं दूसरे देशों को सप्लाई की जा रही हैं उनमें मुख्य रूप से पेरासिटामोल (PCM) टैबलेट और बेहद चर्चित हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन (HCQ) टैबलेट शामिल हैं. भारत ने जिन 30 देशों को वादा किया था, उनमें से 10 को पहले ही PCM टैबलेट सप्लाई कर चुका है. भारत का लक्ष्य 30 लाख रुपये के 3.18 मिलियन टैबलेट मुहैया कराने का है. विशेषज्ञ अभी भी इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि क्या HCQ वाकई काम करता है, लेकिन इसके बावजूद इस संक्रामक बीमारी की रोकथाम के लिए ये सबसे नज़दीकी कारगर दवाई है. ऐसे में भारत की मदद बेहद महत्वपूर्ण है.

इंडियन फार्मास्युटिकल एलायंस (IPA) के अनुमान के मुताबिक़ भारत की क्षमता हर महीने 40 टन HCQ के उत्पादन की है जो कि विश्व की कुल सप्लाई का क़रीब 70 प्रतिशत है. भारत पहले ही 24 देशों को 1.031 करोड़ रुपये के 2.945 मिलियन HCQ टैबलेट अनुदान के ज़रिए सप्लाई कर चुका है. इसके अलावा 28 LAC देशों के लिए 1.75 करोड़ रुपये के 5 मिलियन HCQ टैबलेट और अफ्रीका के 19 देशों के लिए 66.5 लाख रुपये के 1.9 मिलियन HCQ टैबलेट को मंज़ूरी मिल चुकी है. कुल मिलाकर भारत दुनिया भर के 76 देशों को 10 मिलियन HCQ टैबलेट मुहैया कराने का वचन दे चुका है. साथ ही कुवैत और मालदीव जैसे देशों में रैपिड रेस्पॉन्स टीम भेजकर भारत तकनीकी मदद भी दे रहा है और सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए भी प्लेटफॉर्म की स्थापना की है. भारत ने देश के प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ (AIIMS), दिल्ली और पोस्ट ग्रैजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGI), चंडीगढ़ के तत्वावधान में हेल्थकेयर प्रोफेशनल के लिए e-ITEC ट्रेनिंग कार्यक्रम का भी आयोजन किया है.

3 जून तक के आंकड़े के मुताबिक भारत कुल मिलाकर 110-120 करोड़ रुपये (परिवहन लागत शामिल) की कोविड-19 से जुड़ी सहायता 90 देशों को पहुंचाने जा रहा है. ये आंकड़ा बताता है कि दुनिया भर में भारत बिना शर्त, चुपचाप और गाजे-बाजे के बिना मानवीय सहायता मुहैया कराने के मामले में दृढ़ रहा है. मदद हासिल करने वाले देशों में चीन (6.1 करोड़ की क़ीमत) और नेपाल (4.07 करोड़) जैसे देश भी शामिल हैं जिनके साथ हाल के हफ़्तों में भारत के संबंध तनावपूर्ण हुए हैं.

अंतर्राष्ट्रीय आलोचना का मुक़ाबला करने के लिए चीन ने नई रणनीति अपनाई जिसे विश्लेषकों ने ‘वॉल्फ वॉरियर डिप्लोमेसी’ का नाम दिया. इस रणनीति के तहत चीन हर उस तरीक़े का इस्तेमाल कर रहा है जिसके ज़रिए वो महामारी, उसकी शुरुआत और उसके भविष्य को लेकर अंतर्राष्ट्रीय सोच को बदल सके.

वास्तव में महामारी के वक़्त दूसरे देशों की ज़रूरत को लेकर भारत का जवाब चीन जैसे देशों के मुक़ाबले और भी ध्यान देने योग्य बन जाता है. उदाहरण के लिए, चीन की कोविड-19 सहायता कूटनीति की चर्चा बड़े पैमाने पर हो रही है. महामारी का देर से जवाब देने को लेकर चीन की काफ़ी आलोचना हो रही है. चीन की इस देरी की वजह से उसकी सीमा के बाहर संक्रमण तेज़ी से फैला. अंतर्राष्ट्रीय आलोचना का मुक़ाबला करने के लिए चीन ने नई रणनीति अपनाई जिसे विश्लेषकों ने ‘वॉल्फ वॉरियर डिप्लोमेसी’ का नाम दिया. इस रणनीति के तहत चीन हर उस तरीक़े का इस्तेमाल कर रहा है जिसके ज़रिए वो महामारी, उसकी शुरुआत और उसके भविष्य को लेकर अंतर्राष्ट्रीय सोच को बदल सके. इसी इरादे को केंद्र में रखकर चीन कोविड-19 से जुड़ी मदद पहुंचा रहा है.

कंबोडिया, सर्बिया, फ्रांस और इटली समेत दूसरे देशों को मदद देते वक़्त चीन अपने प्रचार का कोई मौक़ा चूक नहीं रहा. लेकिन चीन की मदद में भी खोट है. ख़बरों के मुताबिक़ नीदरलैंड्स और भारत जैसे देशों को चीन ने ख़राब टेस्टिंग किट सप्लाई की है. इससे भी बढ़कर चीन अपने सहायता अभियान के ज़रिए वैश्विक स्वास्थ्य संकट का फ़ायदा उठाने में लगा हुआ है. वो मदद के नाम पर अपने ‘हेल्थ सिल्क रोड’ (HSR) प्रोजेक्ट को फिर से खड़ा करने में लगा हुआ है जो शुरुआत में बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का हिस्सा था. चीन अपनी सहायता के नाम पर मौक़े का फ़ायदा उठाने में लगा हुआ है और ख़ुद को सार्वजनिक स्वास्थ्य शासन प्रणाली में ज़िम्मेदार देश के तौर पर पेश करने में लगा हुआ है. वो संभवत: अपने HSR मॉडल को बीमार पड़ चुके WHO के विकल्प के तौर पर भी पेश कर रहा है. चिंता की बात ये है कि BRI के ढांचे के आधार पर HSR मॉडल WHO के परंपरागत बहुपक्षीय ढांचे की जगह लेता है जहां केंद्र में चीन है.

चीन अपने सहायता अभियान के ज़रिए वैश्विक स्वास्थ्य संकट का फ़ायदा उठाने में लगा हुआ है. वो मदद के नाम पर अपने ‘हेल्थ सिल्क रोड’ (HSR) प्रोजेक्ट को फिर से खड़ा करने में लगा हुआ है जो शुरुआत में बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का हिस्सा था.

कुछ लोग दलील दे सकते हैं कि कोविड-19 के शुरुआती दौर में भारत ने अपनी क्षमता से ज़्यादा दखल दिया. लेकिन ये ध्यान देने योग्य है कि कमज़ोर ढांचे और संसाधनों की कमी के बावजूद भारत ने कई देशों को महत्वपूर्ण मदद मुहैया कराई. वो भी उस वक़्त जब वैश्विक अलगाव की ताक़तें सबसे ज़्यादा मज़बूत थीं. जिस वक़्त ज़्यादातर देश ज़रूरी सामानों के निर्यात पर रोक लगा रहे थे या महामारी की आड़ में मुनाफ़ा कमाने में लगे थे, भारत ने अपने हितों से आगे बढ़कर काम किया. ख़ुद चक्रवाती तूफ़ान और टिड्डी दलों के हमले जैसी प्राकृतिक आपदा का सामना करने और फिर पूरे देश में कोविड-19 के तेज़ी से फैलने के बावजूद भारत ज़िम्मेदार वैश्विक भागीदार के तौर पर अपनी विश्वसनीयता दिखा रहा है, वो भी उस वक़्त जब इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी.

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