कमला हैरिस को लेकर भारत में हो रही परिचर्चा हक़ीक़त से कोसों दूर है

अमेरिका में इस चुनावी साल में जब एक अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड के पुलिस के हाथों मारे जाने के ख़िलाफ़ पूरे देश में प्रदर्शन हुए हैं, तब डेमोक्रेटिक पार्टी ने कमला हैरिस को उप राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाकर अफ्रीकी मूल के अमेरिकी नागरिकों के बीच अपनी पैठ और मज़बूत बनाने की कोशिश की है.

अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन या कन्वेंशन (DNC) विस्कॉन्सिन राज्य के मिलवाउकी में चल रहा है. जिसमें, जो बिडेन को औपचारिक रूप से अमेरिका में इस साल नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी का प्रत्याशी घोषित कर दिया जाएगा.

कमला हैरिस के साथ आने से 77 बरस के जो बिडेन को उन युवा अमेरिकी मतदाताओं के वोट लुभाने का मौक़ा मिलेगा, जिनकी आकांक्षाओं की नुमाइंदगी शायद वो अपनी ज़्यादा उम्र के कारण नहीं करते. और शायद जिनकी उम्मीदों को वो उतने अच्छे ढंग से बयां नहीं कर पाते.

वैसे तो अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव का प्रचार अभियान बेहद नीरस चल रहा था. लेकिन, जब जो बिडेन ने कैलिफ़ोर्निया की सीनेटर और एक समय में राष्ट्रपति पद की प्रत्याशी बनने की होड़ में बाइडेन से मुक़ाबला करने वाली कमला हैरिस को उप राष्ट्रपति पद के लिए अपना साझीदार घोषित किया, तो इस नीरस चुनाव अभियान में एक नई जान आ गई. जो बिडेन ने कमला हैरिस को अपने साथ प्रत्याशी घोषित करके एक ऐतिहासिक क़दम उठाया है. क्योंकि, कमला हैरिस के बारे में बार-बार ये कहा जाता रहा है कि वो किसी बड़ी राष्ट्रीय पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद की प्रत्याशी घोषित होने वाली पहली अश्वेत महिला और पहली एशियाई मूल की अमेरिकी महिला हैं. अमेरिका में इस चुनावी साल में जब एक अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड के पुलिस के हाथों मारे जाने के ख़िलाफ़ पूरे देश में प्रदर्शन हुए हैं, तब डेमोक्रेटिक पार्टी ने कमला हैरिस को उप राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाकर अफ्रीकी मूल के अमेरिकी नागरिकों के बीच अपनी पैठ और मज़बूत बनाने की कोशिश की है. ऐसी अपेक्षा की जा रही है कि हैरिस के साथ आने के कारण, जो बिडेन के पक्ष में अफ्रीकी समुदाय और मज़बूती से खड़ा होगा. अमेरिका में इस बार के राष्ट्रपति चुनाव में अश्वेत मतदाता न केवल मुख्य बैटलग्राउंड राज्यों जैसे कि मिशिगन, पेन्सिल्वेनिया और विस्कॉन्सिन में अहम साबित होंगे. बल्कि, रिपब्लिकन पार्टी की ओर झुकाव रखने वाले दक्षिणी राज्यों जैसे कि जॉर्जिया और फ्लोरिडा में भी अश्वेत मतदाताओं के वोट महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे. क्योंकि इन दोनों ही राज्यों में इस बार डेमोक्रेटिक पार्टी भी रिपब्लिकन पार्टी को तगड़ी टक्कर दे रही है. कमला हैरिस के साथ आने से 77 बरस के जो बिडेन को उन युवा अमेरिकी मतदाताओं के वोट लुभाने का मौक़ा मिलेगा, जिनकी आकांक्षाओं की नुमाइंदगी शायद वो अपनी ज़्यादा उम्र के कारण नहीं करते. और शायद जिनकी उम्मीदों को वो उतने अच्छे ढंग से बयां नहीं कर पाते. जो बिडेन की ज़्यादा उम्र होने के कारण ये कयास भी लगाए जा रहे हैं कि हो सकता है कि राष्ट्रपति चुने जाने के बाद बिडेन सिर्फ़ एक कार्यकाल यानी चार बरस के लिए ही राष्ट्रपति पद पर रहें. और 2024 में कमला हैरिस को डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाया जाए. इसलिए, जो बिडेन ने कमला हैरिस को उप राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी चुन कर डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रचार अभियान में नया जोश भर दिया है. कमला हैरिस के उप राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनने से अमेरिका के नागरिकों के लिए जश्न मनाने और ख़ुश होने का बड़ा अवसर मिला है. भले ही, नवंबर में होने वाले मतदान का नतीजा कुछ भी हो.

कमला हैरिस के अमेरिकी चुनाव में प्रत्याशी बनने को लेकर भारत में जिस तरह से बड़े ज़ोर-शोर की परिचर्चाएं शुरू हो गई हैं, वो बहुत परेशान करने वाली हैं. भारत में ये अटकलें लगाई जा रही हैं कि अगर कमला हैरिस अमेरिका की उप राष्ट्रपति बन गईं, तो आख़िर उससे भारत और अमेरिका के आपसी संबंध पर कैसा असर पड़ेगा.

मगर, कमला हैरिस के अमेरिकी चुनाव में प्रत्याशी बनने को लेकर भारत में जिस तरह से बड़े ज़ोर-शोर की परिचर्चाएं शुरू हो गई हैं, वो बहुत परेशान करने वाली हैं. भारत में ये अटकलें लगाई जा रही हैं कि अगर कमला हैरिस अमेरिका की उप राष्ट्रपति बन गईं, तो आख़िर उससे भारत और अमेरिका के आपसी संबंध पर कैसा असर पड़ेगा. और कोई असर पड़ेगा भी या नहीं. भारत, जो ख़ुद को आत्म विश्वास से भरपूर उभरती हुई ताक़त कहते नहीं थकता, वहां पर कमला हैरिस को लेकर हो रही ये परिचर्चा हमारी बुनियादी कमज़ोरी को उजागर करती है. ये एक ऐसी कमज़ोरी है, जिसकी वजह से हम ये सोचते हैं कि भारत का भविष्य दूसरों द्वारा उठाए गए क़दमों से तय होगा. जबकि, हमें तो ये सोचना चाहिए कि हम अपने काम से, अपनी उपलब्धियों से भारत के बारे में दूसरों की राय बदलने में सफल होंगे. बार-बार कमला हैरिस के भारतीय मूल की होने का गुणगान करके तो हम ख़ुद की आकांक्षाओं के साथ इंसाफ़ कर रहे हैं. और न ही हम कमला हैरिस के साथ न्याय कर रहे हैं. क्योंकि कमला हैरिस ने तो हमेशा ही सबसे पहले अपनी पहचान अश्वेत होने का दावा किया है. कमला ने बार बार ये कहा है कि, ‘हां, मैं अश्वेत हूं, और मुझे इस पर गर्व है. मैं अश्वेत पैदा हुई थी. मेरी मौत भी एक अश्वेत की मौत होगी.’ इस बात के बिल्कुल भी सबूत नहीं हैं कि कमला हैरिस ने कभी भारत के साथ अपने संबंधों के बारे में कुछ कहा हो. पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने जो राजनीतिक सफर तय किया है, उसमें उनके भारत से संबंध की कोई छाप नहीं मिलती. हमें कमला के इस चुनाव का सम्मान करना चाहिए. और ज़बरदस्ती अपने एहसास उन पर नहीं थोपने चाहिए.

कुल मिलाकर, कमला हैरिस अमेरिका की राजनीति में एक ताक़तवर नेता के तौर पर उभरी हैं. जो अमेरिकी राजनीतिक शतरंज के दांव अच्छी तरह से जानती हैं. और उनसे यही अपेक्षा भी की जानी चाहिए कि वो अपनी राजनीतिक कुशलता का इस्तेमाल, अपने देश अमेरिका के हितों का ध्यान रखने में करेंगी. असल में हमें करना ये चाहिए था कि विदेश नीति पर कमला हैरिस के विचारों और नीतियों की समीक्षा करते, न कि भारत से उनके संबंध को लेकर इतना ख़ुश होते. विदेश नीति के मोर्चे पर कमला हैरिस का कोई ख़ास ट्रैक रिकॉर्ड नहीं रहा है. इसलिए, अब तक के उनके तजुर्बों के आधार पर हम बमुश्किल ही इस बात का अंदाज़ा लगा सकते हैं कि भविष्य में वो विदेश नीति के मसलों पर कैसा रुख़ अपनाएंगी. और जहां तक बात राष्ट्रीय सुरक्षा की है, तो इस मोर्चे पर तो वो और भी कमज़ोर दिखती हैं. अपने प्रचार अभियान के दौरान कमला हैरिस ने विदेश नीति के मोर्चे पर बेहद अस्पष्ट रुख़ अपना रखा था. वो कभी भी अमेरिका की विदेश नीति को लेकर अपना व्यापक दृष्टिकोण स्पष्ट नहीं कर सकीं. विदेश नीति के ज़्यादातर मसलों पर कमला हैरिस का रुख़ डेमोक्रेटिक पार्टी की ऐतिहासिक नीति के अनुसार ही रहा है. मिसाल के तौर पर, कमला हैरिस के मुताबिक़, ‘अमेरिका की विदेश नीति की सबसे बड़ी उपलब्धि ये रही है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद हम ने कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों की स्थापना की, अंतरराष्ट्रीय क़ानून बनाए और कई लोकतांत्रिक देशों के निर्माण में मदद की.’

अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के मतदाताओं को लुभाने के लिए जो बिडेन पहले ही कह चुके हैं कि वो राष्ट्रपति चुने गए, तो H-1B वीज़ा की व्यवस्था को नए सिरे से ढालेंगे. इसके अलावा बिडेन ने हर देश के लिए ग्रीन कार्ड के कोटे को भी ख़त्म करने का वादा किया है.

हम बड़े भरोसे के साथ ये कह सकते हैं कि अगर जो बिडेन राष्ट्रपति चुने जाते हैं, तो अपने प्रशासन की विदेश नीति की अगुवाई वो ख़ुद करेंगे. क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के मसलों पर बिडेन को काफ़ी लंबा तजुर्बा है. और जो बाइडेन ने कहा है कि अगर वो राष्ट्रपति बनते हैं तो तमाम चुनौतियों से निपटने में पूरी तरह भारत के साथ खड़े होंगे. बिडेन ने भारत और अमेरिका की दोस्ती को और मज़बूत बनाने का भी वादा किया है. अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के मतदाताओं को लुभाने के लिए जो बिडेन पहले ही कह चुके हैं कि वो राष्ट्रपति चुने गए, तो H-1B वीज़ा की व्यवस्था को नए सिरे से ढालेंगे. इसके अलावा बिडेन ने हर देश के लिए ग्रीन कार्ड के कोटे को भी ख़त्म करने का वादा किया है. वहीं दूसरी ओर, डोनाल्ड ट्रंप ये दावा करते हैं कि कमला हैरिस से भी ज़्यादा भारतीय मूल के मतदाताओं का समर्थन उन्हें हासिल है. दोनों प्रत्याशियों के बयानों से ज़ाहिर है कि वो अमेरिका में रह रहे भारतीय मूल के मतदाताओं को लुभाने में जुटे हैं. क्योंकि, अमेरिकी समाज में भारतीय मूल का समुदाय काफ़ी प्रभावशाली माना जाता है.

ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके अपने हितों को आगे बढ़ाने में बेहद कुशल हो गए हैं. और इससे भी महत्वपूर्ण बात ये है कि अमेरिका में किसी भी पार्टी की सत्ता हो, भारत आज अमेरिका के लिए बेहद महत्वपूर्ण सामरिक साझेदार बन चुका है, जिसे रिझाना अमेरिका के लिए बेहद ज़रूरी हो चुका है. कमला हैरिस का पुराना रिकॉर्ड देखें, तो भारत से संबंधित कई पुराने मामलों में उन्होंने अमेरिका के आधिकारिक रुख़ के विपरीत रवैया अपनाया है. जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटने के बाद, कमला हैरिस ने कहा था कि, ‘हमें कश्मीर की जनता को ये यक़ीन दिलाना होगा कि वो दुनिया में अकेले नहीं पड़े हैं. वहां के हालात पर हमारी नज़र है. हालात पैदा हुए तो वहां अमेरिका को दख़ल भी देना चाहिए.’ जब भारत के विदेश मंत्री डॉक्टर एस. जयशंकर अमेरिकी संसद की फ़ॉरेन रिलेशन्स कमेटी की बैठक में इस वजह से शामिल नहीं हुए क्योंकि उस बैठक में वो प्रमिला जयपाल भी शामिल थीं, जिन्होंने अमेरिकी संसद के निचले सदन यानी हाउस ऑफ़ रिप्रेज़ेंटेटिव्स में कश्मीर मसले पर एक प्रस्ताव पेश किया था, जिसे डॉक्टर जयशंकर ने ये कह कर ख़ारिज किया था कि ये प्रस्ताव भारत सरकार द्वारा उठाए गए क़दमों की सही नुमाइंदगी नहीं करता है. कमला हैरिस ने भारत के विदेश मंत्री के कमेटी की बैठक में शामिल न होने की आलोचना की थी.

जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटने के बाद, कमला हैरिस ने कहा था कि, ‘हमें कश्मीर की जनता को ये यक़ीन दिलाना होगा कि वो दुनिया में अकेले नहीं पड़े हैं. वहां के हालात पर हमारी नज़र है. हालात पैदा हुए तो वहां अमेरिका को दख़ल भी देना चाहिए.’

लेकिन, भारत जैसे देश के लिए ऐसी घटनाएं होना आम बात होनी चाहिए. न तो हमें कमला हैरिस के बयानों को लेकर बहुत चिंतित होना चाहिए. और, न ही उनके भारतीय मूल के होने को लेकर बहुत उत्साहित होना चाहिए. हमें असली चिंता तो इस बात की होनी चाहिए कि भारत के लोग अपने देश की प्रगति के हिसाब से ख़ुद को बदलने में असफल रहे हैं. हम पूरी दुनिया पर अपनी छाप छोड़ना चाहते हैं. लेकिन, ये मानने को तैयार नहीं हैं कि भारत में आज दूसरे लोगों पर अपनी छाप छोड़ने की क्षमता है. अमेरिका की विदेश नीति, 21वीं सदी के हिसाब तय होगी. इसमें दुनिया के बदल रहे बुनियादी हालात में अमेरिका के हितों पूर्ति को प्राथमिकता दी जाएगी. और जहां तक बात अमेरिका और भारत के संबंध की है, तो इस राह में व्यक्तित्वों की अहमियत तो कब की ख़त्म हो चुकी है. बराक ओबामा, भारत के बारे में एक बनी बनायी सोच के साथ अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर आसीन हुए थे. फिर चाहे परमाणु अप्रसार का मसला हो या फिर कश्मीर का मुद्दा. इन सभी विषयों पर वो भारत से सख़्ती बरतना चाहते थे. लेकिन, आठ साल के कार्यकाल के बाद जब ओबामा व्हाइट हाउस से रुख़सत हुए, तो वो भारत के सबसे महान दोस्तों में तब्दील हो चुके थे. डोनाल्ड ट्रंप भी एक ऐसे चुनाव प्रचार अभियान के बाद राष्ट्रपति बने थे, जिसमें उन्होंने चीन के साथ-साथ भारत पर भी लगातार हमले किए थे. और भारत के साथ वो केवल औपचारिक और ज़रूरी संबंध रखना चाहते थे. मगर, उनके चार साल के कार्यकाल के आख़िरी चरण में हम ये कह सकते हैं कि भारत और अमेरिका के संबंध न केवल और मज़बूत हुए हैं. बल्कि, आज भारत, अमेरिका के पुराने और मज़बूत दोस्तों के मुक़ाबले उसके ज़्यादा क़रीब है.

अमेरिका की विदेश नीति, 21वीं सदी के हिसाब तय होगी. इसमें दुनिया के बदल रहे बुनियादी हालात में अमेरिका के हितों पूर्ति को प्राथमिकता दी जाएगी. और जहां तक बात अमेरिका और भारत के संबंध की है, तो इस राह में व्यक्तित्वों की अहमियत तो कब की ख़त्म हो चुकी है.

अब अगर इस साल नवंबर में जो बिडेन और कमला हैरिस की जोड़ी राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतती है. तो, भारत के संबंध इस आधार पर नहीं तय होंगे कि कमला हैरिस, भारतीय मूल की हैं. न ही अमेरिका की भारत नीति कश्मीर पर कमला हैरिस के बयान से तय होगी. बल्कि दोनों देशों के संबंध उन हालात के आधार पर तय होंगे, जिसका सामना आज भारत और अमेरिका कर रहे हैं. दोनों देश केवल हिंद-प्रशांत की परिस्थितियों के हिसाब से एक दूसरे के क़रीब नहीं आएंगे. बल्कि, पूरी दुनिया की बदलती सामरिक स्थिति, इन संबंधों की दशा और दिशा तय करेगी. इस बारे में हो रही बाक़ी सारी बातें बस वक़्त का शोर हैं. 


यह लेख मूल रूप से मनी कंट्रोल में प्रकाशित हो चुका है.

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