अमेरिका बनाम चीन: लोकतंत्र बचाने की चुनौती 

अपने भाषण में माइक पॉम्पियो ने चीन को लेकर ट्रंप प्रशासन की नीति का हवाला देते हुए कहा था कि ये, ‘धीरे धीरे सख़्त हो रही है.’ और इसमें समान विचारों वाले देश भी साथ दे रहे हैं 

पिछले महीने, अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने चीन के बारे में एक भाषण दिया था. पॉम्पियो का ये भाषण आश्चर्यजनक रूप से बेहद बेबाक था. जिसमें उन्होंने चीन की जनता और विश्व के आज़ाद ख़याल देशों से अपील की कि वो चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का बर्ताव बदलने की कोशिश करें. पॉम्पियो ने बड़ी साफ़गोई से तर्क देते हुए कहा कि, ‘अगर मुक्त विश्व, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को नहीं बदलता है, तो चीन की कम्युनिस्ट पार्टी निश्चित रूप से हमें बदल देगी.’ अमेरिका के विदेश मंत्री ने चीन के साथ अपने देश के बीच बढ़ते टकराव को मुक्त विश्व और एक षडयंत्रकारी ताक़त के बीच संघर्ष की संज्ञा दी. पॉम्पियो ने सुझाव दिया कि अमेरिका को चीन के साथ अंधे होकर संवाद बनाए रखने से बाज़ आना चाहिए. साथ ही साथ, पॉम्पियो ने ये भी कहा कि अमेरिका को चाहिए कि वो चीन के नागरिकों को सशक्त बनाए, ताकि वो अपने देश की कम्युनिस्ट पार्टी की तानाशाही से मुक़ाबला कर सकें. ज़ाहिर है कि चीन ने माइक पॉम्पियो के इस भाषण का जवाब अपने मिज़ाज के मुताबिक़ ही दिया. चीन ने कहा कि पॉम्पियो का भाषण हक़ीक़त की अनदेखी करने वाला है. अमेरिकी विदेश मंत्री का ये भाषण, वैचारिक पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है. मगर, सबसे मज़ेदार बात तो ये थी कि अमेरिका का नीति निर्धारण करने वाले आभिजात्य वर्ग में से गिने चुने लोग ही थे, जिन्होंने माइक पॉम्पियो के बुनियादी तर्कों को चुनौती देने का साहस दिखाया.

अमेरिका के विदेश मंत्री ने चीन के साथ अपने देश के बीच बढ़ते टकराव को मुक्त विश्व और एक षडयंत्रकारी ताक़त के बीच संघर्ष की संज्ञा दी. पॉम्पियो ने सुझाव दिया कि अमेरिका को चीन के साथ अंधे होकर संवाद बनाए रखने से बाज़ आना चाहिए

आज की तारीख़ में अमेरिका और चीन के संबंध ऐतिहासिक रूप से बेहद ख़राब दौर से गुज़र रहे हैं. वहीं, अमेरिका में विदेश नीति और चीन के मामलों के तमाम विशेषज्ञों के बीच, चीन को लेकर एक आम राय बनती दिख रही है. पिछले कुछ महीनों में डोनाल्ड ट्रंप की सरकार ने लगातार चीन के ऊपर शिकंजा कसने वाले क़दम उठाए हैं. ट्रंप प्रशासन ने मानवाधिकारों से लेकर, व्यापार और तकनीक, कूटनीतिक और आधिकारिक रूप से संवाद कम करने से लेकर अकादेमिक और विद्वानों की आवाजाही तक, कई मोर्चों पर चीन के ख़िलाफ़ कार्रवाई की है. अभी हाल ही में अमेरिका ने चीन को अपने टेक्सस राज्य के ह्यूस्टन शहर में स्थित वाणिज्य दूतावास बंद करने को कहा. जिसके बाद चीन ने भी पलटवार करते हुए, अपने दक्षिणी पश्चिमी शहर चेंगदू में स्थित अमेरिकी वाणिज्य दूतावास को ख़ाली करने का आदेश दिया और उसे अपने क़ब्ज़े में ले लिया.

अमेरिका ने दक्षिणी चीन सागर में भी चीन के दावों का मज़बूती से विरोध करने का फ़ैसला लिया है. माइक पॉम्पियो ने इस बारे में बयान जारी करके कहा था कि दक्षिणी चीन सागर में चीन का अधिकतर दावा ‘पूरी तरह से ग़ैरक़ानूनी’ है. पॉम्पियो ने चीन से कहा था कि वो इस महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक क्षेत्र में दादागीरी दिखाना बंद कर दे. इससे पहले की अमेरिकी सरकारें, चीन के ख़िलाफ़ इस तरह खुल कर सामने आने से बचा करती थीं. लेकिन, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के लिए एक लक्ष्मण रेखा खींच दी है. इस के साथ-साथ ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका की तरफ़ से हॉन्ग कॉन्ग को मिली विशेष व्यापारिक छूटों को भी ख़त्म कर दिया है. अमेरिका ने हॉन्ग कॉन्ग को तरज़ीह देने से रोक का क़दम तब उठाया, जब चीन ने तमाम विरोधों को दरकिनार करते हुए हॉन्ग कॉन्ग में राष्ट्रीय सुरक्षा का नया क़ानून लागू कर दिया था. जिसके कारण हॉन्ग कॉन्ग की स्वायत्तता ख़त्म हो गई. और चीन की मुख्य भूमि के साथ उसके संबंध भी परिवर्तित हो गए. क्योंकि इस क़ानून के लागू होने से हॉन्ग कॉन्ग के नागरिकों को मिली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अंत हो गया. अमेरिका ने, शिन्जियांग के अल्पसंख्यक वीगर मुसलमानों के ख़िलाफ़ चीन की कार्रवाई का विरोध करते हुए, चीन के कई अधिकारियों पर प्रतिबंध भी लगा दिए हैं. इनमें चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के कई वरिष्ठ सदस्य शामिल हैं.

यहां तक कि ताइवान और तिब्बत के मामले में भी ट्रंप प्रशासन ने चीन को झटके देने की कोशिश की है. इस साल की शुरुआत में ही अमेरिकी सरकार ने ताइवान को 180 अरब अमेरिकी डॉलर के हथियारों की बिक्री को मंज़ूरी दे दी थी. इसके अलावा, अमेरिका ने चीन के उन अधिकारियों के ख़िलाफ़ भी एक्शन लिया है, जो अमेरिकी अधिकारियों और नागरिकों को मुक्त रूप से तिब्बत जाने की राह में बाधाएं खड़ी करते हैं. यहां तक कि, ट्रंप की सरकार चीन के अकादेमिक क्षेत्र के लोगों को भी निशाना बना रही है. ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका आने वाले चीन के उन छात्रों और रिसर्चरों के वीज़ा रद्द करने का क़दम उठाया है, जिनके बारे में उसे लगता है कि उनके संबंध चीन की सेना से हो सकते हैं.

ट्रंप प्रशासन ने मानवाधिकारों से लेकर, व्यापार और तकनीक, कूटनीतिक और आधिकारिक रूप से संवाद कम करने से लेकर अकादेमिक और विद्वानों की आवाजाही तक, कई मोर्चों पर चीन के ख़िलाफ़ कार्रवाई की है

चीन को लेकर अमेरिका की नीति में बदलाव की शुरुआत आज से चार साल पहले हुई थी. जब राष्ट्रपति चुनाव के लिए प्रचार के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने चीन को निशाना बनाना शुरू किया था. ट्रंप ने सत्ता में आने के बाद व्यापार और तकनीक के मोर्चे पर चीन से दूरी बनाने का अब तक का सबसे गंभीर अमेरिकी अभियान शुरू कर दिया. चीन की सबसे बड़ी तकनीकी कंपनी ख्वावे, चीन के ख़िलाफ़ अमेरिका के एक्शन का सबसे बड़ा प्रतीक बन गई है. अमेरिका, चीन की इस कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने के लिए पूरे विश्व में अभियान चला रहा है. हाल ही में ब्रिटेन ने भी ख्वावे को अपने 5G नेटवर्क से अलग करने की घोषणा की थी. जबकि, इससे पहले ब्रिटेन ने ख्वावे को अपने यहां के 5G नेटवर्क में शामिल होने की अनुमति दे दी थी. ब्रिटेन ने अपने देश की कंपनियों के ख्वावे से नए 5G उपकरण ख़रीदे पर रोक लगा दी है. हाल ही में,डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के ऐप टिक टॉक पर प्रतिबंध लगाने के संकेत दिए थे. लेकिन, अब उन्होंने अमेरिकी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट को छह हफ़्तों की रियायत दी है. जिससे कि वो टिक टॉक के अमेरिकी कारोबार को ख़रीद सके. अमेरिका के डेटा तक चीन की पहुंच को रोकने के लिए हाल ही में अमेरिकी सरकार ने ‘क्लीन नेटवर्क प्रोग्राम’ की शुरुआत की है. जिसके कारण चीन की संचार कंपनियों और चीन के ऐप्स के लिए अमेरिकी कारोबारियों और नागरिकों के संवेदनशील डेटा हासिल कर पाना मुश्किल हो जाएगा.

हाल के कुछ महीनों के दौरान, अमेरिका और चीन के संबंध अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं. और शायद आने वाले दिनों में इनमें और गिरावट आए. क्योंकि, अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव अब क़रीब हैं. चुनावी राजनीति से अलग अब इस बात पर जानकारों में आम राय बन रही है कि अमेरिका और चीन के संबंधों में अब एक नया मोड़ आ गया है. अगर नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों में डोनाल्ड ट्रंप हार भी जाते हैं, तो भी चीन और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों में अब बहुत बड़ा बदलाव आ पाना मुश्किल है. चीन के साथ अच्छे संबंध को लेकर, क़रीब पांच दशकों और छह राष्ट्रपतियों के कार्यकाल से चली आ रही अमेरिकी राजनीति की आम सहमति अब समाप्ति के दौर में है. पहले जहां अमेरिकी नेता इस बात को लेकर प्रतिबद्ध थे कि अमेरिका को चीन की तरक़्क़ी को प्रोत्साहित करना चाहिए. वहीं अब चीन को लेकर हर मोर्चे को अमेरिका शक की निगाह से देख रहा है. फिर चाहे वो आर्थिक हो, राजनीतिक हो, कूटनीतिक हो या अकादेमिक क्षेत्र. अब ये माना जा रहा है कि ट्रंप ने चीन को पक्षपातपूर्ण व्यापार और आक्रामक कूटनीतिक अभियान के लिए निशाना बनाया, तो ठीक ही किया. डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रत्याशी जो बाइडेन, चीन को लेकर ट्रंप की नीतियों को बुनियादी तौर पर कोई चुनौती नहीं दे रहे हैं.

अगर नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों में डोनाल्ड ट्रंप हार भी जाते हैं, तो भी चीन और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों में अब बहुत बड़ा बदलाव आ पाना मुश्किल है. चीन के साथ अच्छे संबंध को लेकर, क़रीब पांच दशकों और छह राष्ट्रपतियों के कार्यकाल से चली आ रही अमेरिकी राजनीति की आम सहमति अब समाप्ति के दौर में है

हालांकि, अभी भी ये सवाल बना हुआ है कि, क्या अमेरिका, चीन से अकेले निपट पाने में सक्षम है? अपने भाषण में माइक पॉम्पियो ने चीन को लेकर ट्रंप प्रशासन की नीति का हवाला देते हुए कहा था कि ये, ‘धीरे धीरे सख़्त हो रही है.’ और इसमें समान विचारों वाले देश भी साथ दे रहे हैं. पॉम्पियो ने लोकतांत्रिक देशों से अपील की थी कि, ‘दुनिया के तमाम स्वतंत्र देशों को चाहिए कि वो और आक्रामक और क्रिएटिव तरीक़े से चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बर्ताव में बदलाव लाने की कोशिश करें. क्योंकि चीन के व्यवहार से हमारे देशों की जनता और हमारी समृद्धि को ख़तरा है.’ माइक पॉम्पियो बिल्कुल सही कह रहे हैं. अगर दुनिया के तमाम बड़े लोकतांत्रिक देश चीन का मुक़ाबला करने के लिए एक दूसरे के साथ नहीं आते हैं, तो सब के सब मिलकर एक बड़े वैचारिक युद्ध में पराजय का सामना करेंगे. जैसै जैसे ये संघर्ष तेज़ होता जा रहा है, वैसे वैसे भारत के सामने में भी विकल्प एकदम स्पष्ट होते जा रहे हैं. भारत को अगर चीन जैसे ताक़तवर पड़ोसी देश का मज़बूती से मुक़ाबला करना है, तो उसे भी उन बुनियादी मूल्यों के बारे में खुलकर और बार बार बोलना होगा, जो अन्य लोकतांत्रिक देशों को एक डोर में बांधते हैं. क्योंकि, हिमालय की सीमा पर भारत को चीन की ओर से अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ चुनौती मिल रही है. ऐसे में अब भारत को इस मुद्दे पर लंबे समय से चली आ रही मौन की आदत को बदलना ही होगा.

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