अनुच्छेद 370: नए सामान्य हालात में अपनी राह बनाता नया ‘कश्मीर’

भारत अपनी सरहदों पर ढीली-ढाली व्यवस्था को मज़बूत करने के बारे में अपनी मंशा साफ कर रहा है और यह उन लोगों को असहज करेगी जो यथास्थिति के साथ सहज थे.

यह एक साल पहले 5 अगस्त 2019 का दिन था जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में अनुच्छेद 370 और 35ए को रद्द करने की घोषणा की, जिसने पूर्व जम्मू कश्मीर को दो केंद्र शासित राज्यों- जिनमें लद्दाख बिना विधानसभा के और जम्मू कश्मीर विधानसभा के साथ, में बांट दिया गया था. यह एक साहसिक फ़ैसला था जिसकी 31 अक्टूबर 2019 को लागू हो जाने के साथ ही राष्ट्रीय और वैश्विक प्रतिक्रिया हुई. पाकिस्तान और उसके ‘सदाबहार’ मित्र चीन जाहिर तौर पर नई दिल्ली के दांव से परेशान थे ही, अनुच्छेद 370 का समापन भारत में भी कइयों के लिए हजम करना मुश्किल था. हम यथास्थिति के इतने आदी हो चुके हैं कि इन हालात में कोई भी बदलाव हमारी दिमागी सोच को झकझोर देता है. लेकिन यह भी एक हक़ीकत है कि हममें से बहुत से लोग इसे अनदेखा करना चाहेंगे, कश्मीर में यथास्थिति काफी समय पहले बर्दाश्त से बाहर हो चुकी थी. यह केवल राजनीतिक और नीतिगत जड़ता थी जो भारतीय नीति नियंताओं को इसे ख़त्म करने से रोक रही थी.

यह भी एक हक़ीकत है कि हममें से बहुत से लोग इसे अनदेखा करना चाहेंगे, कश्मीर में यथास्थिति काफी समय पहले बर्दाश्त से बाहर हो चुकी थी. यह केवल राजनीतिक और नीतिगत जड़ता थी जो भारतीय नीति नियंताओं को इसे ख़त्म करने से रोक रही थी.

एक साल बाद कोविड -19 महामारी की चुनौती के बावजूद, जम्मू कश्मीर और लद्दाख दोनों में चीजें स्थिर होने लगी हैं. वैश्विक स्तर पर भारत के फैसले को काफी हद तक एक आंतरिक मामले के रूप में देखा गया और पाकिस्तान किसी भी तरह का समर्थन जुटा पाने में नाकाम रहा. यहां तक ​​कि अरब खाड़ी के देशों, जैसे कि यूएई और सऊदी अरब ने भी, जो पाकिस्तान के परंपरागत साझीदार रहे हैं, इस्लामाबाद की गुहारों की अनदेखी की. इस हताशा के चलते पाकिस्तान अब एक नया नक्शा जारी कर रहा है जिसमें पूरे जम्मू कश्मीर और गुजरात के कुछ हिस्सों को अपने इलाक़े के रूप में दिखाया है. विदेश मंत्रालय ने इस कदम को “राजनीतिक विवेकशून्यता” का कदम करार देकर ठीक ही किया है, क्योंकि इसका मक़सद पूरी तरह कश्मीर के मुद्दे को वैश्विक एजेंडे पर वापस लाना है. हमेशा की तरह, यह नाकाम ही होना है. 

घरेलू मोर्चे पर, शासन में जिस तरह चलता था उसमें बड़ा बदलाव आया है, और उन लोगों को फ़ायदा मिलना शुरू हो गया है जो असल में राष्ट्रीय और बौद्धिक चर्चा का हिस्सा ही नहीं थे- वाल्मीकि, गोरखा और दलित जैसे वंचित और हाशिए पर रहने वाले समुदाय. एक छोटे राजनीतिक अभिजात्य वर्ग ने सबकुछ कब्ज़े में कर लिया था और ख़ुद इस क्षेत्र के अतीत व भविष्य के नियंता बन गए थे, और इस तरह विशाल बहुमत को दरकिनार कर दिया गया. पिछले साल अस्तित्व में आई नई प्रशासनिक व्यवस्था की शुरुआत के साथ, यह वो खामोश बहुमत है जो क्षेत्रीय और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में अपनी आवाज़ और भूमिका फिर से हासिल कर रहा है क्योंकि केंद्रीय कानून यहां लागू होने लगे हैं. कई कानून जैसे कि शिक्षा का अधिकार, माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का कल्याण और गुजारा भत्ता अधिनियम-2001, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिनियम और महिलाओं, बच्चों, विकलांगों के लाभ के लिए अधिनियम, अधिग्रहीत की गई ज़मीन का उचित मुआवज़ा और साथ ही 73वें और 74वें संशोधन जिनसे जम्मू कश्मीर के लोगों को वंचित कर दिया गया था, अब लागू हो गए हैं. सरकार द्वारा अपने शासन के एजेंडे को आगे बढ़ाने के साथ कमज़ोर वर्गों के लिए रोज़गार के नए मौक़े बने हैं. यह उन लोगों को सशक्त बनाने में मील का पत्थर साबित होगा, जिन्हें देश की आज़ादी के सातवें दशक में भी नजरअंदाज़ किया जा रहा था और यह जम्मू कश्मीर और लद्दाख को राष्ट्रीय मुख्यधारा से जोड़ने में भी महत्वपूर्ण होगा.

पिछले साल अस्तित्व में आई नई प्रशासनिक व्यवस्था की शुरुआत के साथ, यह वो खामोश बहुमत है जो क्षेत्रीय और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में अपनी आवाज़ और भूमिका फिर से हासिल कर रहा है क्योंकि केंद्रीय कानून यहां लागू होने लगे हैं.

यह उस तरीके में भी दिखाई दे रहा है जिसमें घिसट रही विकास परियोजनाओं में तेज़ी आ गई है. साल 2018 तक 7,000 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाएं विभिन्न चरणों में अटकी थीं. यहां तक ​​कि 2015 में घोषित सामाजिक-आर्थिक बुनियादी ढांचे के लिए प्रधानमंत्री के राहत पैकेज को भी वह तेज़ी नहीं मिली, जो मिलनी चाहिए थी, लेकिन पिछले साल बुनियादी ढांचे और अन्य क्षेत्रों में विभिन्न निवेश परियोजनाओं में तेज़ी आ गई है. श्रीनगर में रामबाग़ फ्लाईओवर और श्रीनगर लेह ट्रांसमिशन लाइन जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाएं पूरी हो गई हैं. स्वास्थ्य और पनबिजली से लेकर रेलवे और पुलों तक, प्रमुख परियोजनाओं पर तय टाइमटेबल और नियमित निगरानी के साथ काम किया जा रहा है. सीमावर्ती इलाक़ों में बुनियादी ढांचे के विकास के साथ-साथ कल्याणकारी योजनाओं को लागू किए जाने पर ख़ास ध्यान दिया जा रहा है. 

सरकार ने घरों के विद्युतीकरण में 100% लक्ष्य हासिल करने के बाद दूरदराज़ के गांवों तक सभी के लिए पानी और सड़क संपर्क सुनिश्चित करने का काम कर रही है. जबकि जॉब मार्केट तेजी से बदल रहा है और नौकरी मांगने वालों को नौकरी देने वाले में बदलने की फ़ौरन ज़रूरत है, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्रों में- खा़सतौर से स्थानीय युवाओं का विशिष्ट कौशल बढ़ाने पर ध्यान दिया जा रहा है. जम्मू कश्मीर के साथ-साथ लद्दाख के आर्थिक भविष्य के वास्ते निजी निवेश को आकर्षित करने के लिए एक बड़ा अभियान शुरू किया गया है.

उल्लेखनीय है कि जहां आलोचक जम्मू-कश्मीर में कथित रूप से लोकतंत्र की कमी की बीन बजाना जारी रखे हैं, वहीं ज़मीनी स्तर पर लोकतंत्र असल में 2018 के पंचायती राज चुनावों के साथ फल-फूल रहा है, जिसमें 74.1 प्रति मतदाताओं ने मतदान किया था, जिसके बाद अक्टूबर 2019 में खंड विकास परिषदों के चुनाव हुए जम्मू और कश्मीर के इतिहास में पहली बार रिकॉर्ड 98.3% मतदाताओं ने मतदान किया. इससे नई आवाज़ें और नए खिलाड़ी राजनीति के क्षेत्र में आए हैं, जो चंद परिवारों के स्थानीय राजनीति पर हावी रहने के चलन के उलट है. जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिए यह बड़े उलटफेर का नज़रिया ज़्यादा टिकाऊ आधार है.

उल्लेखनीय है कि जहां आलोचक जम्मू-कश्मीर में कथित रूप से लोकतंत्र की कमी की बीन बजाना जारी रखे हैं, वहीं ज़मीनी स्तर पर लोकतंत्र असल में 2018 के पंचायती राज चुनावों के साथ फल-फूल रहा है, जिसमें 74.1 प्रति मतदाताओं ने मतदान किया था

 

जम्मू कश्मीर और लद्दाख के सामरिक महत्व को देखते हुए, नई दिल्ली के लिए अपने सुधारों को तार्किक नतीजे पर ले जाना ज़रूरी है. अचंभे की बात है कि अतीत की यथास्थिति को चुनौती देने में इतना समय लगा. वैसे, अब जबकि इसे चुनौती दी गई है, तो पीछे नहीं हटना चाहिए. कुछ नकारात्मक वैश्विक हेडलाइंस के बावजूद, वहां शुरू किए गए उपायों की सफलता के लिए ख़ामोश बहुमत का समर्थन है. आश्चर्य नहीं कि चंद लोग आज भी धारा 370 की बहाली की मांग कर रहे हैं.

लेकिन यहां तक ​​कि जिन लोगों ने पुराने संस्थागत ढांचे के इर्दगिर्द अपना करियर बनाया था, लगता है कि उन्होंने भीनए सामान्य हालात’से ख़ुद को समायोजित कर लिया है, जहां जम्मू कश्मीर के असली हितधारी नियंता की भूमिका हैं और अपनी आकांक्षाओं के अनुरूप भविष्य को गढ़ रहे हैं. 

सरकार के सुधार के एजेंडे की क़ामयाबी जम्मू कश्मीर के लोगों और भारत के अपने भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है. और इसके पूरी तरह अमल में आने में समय लगेगा. हालांकि, भारत में आलोचक इन उपायों के बारे में नुक़्ताचीनी करते रहते हैं, और भारत के विरोधियों द्वारा उनकी मंशा की गंभीरता की सराहना की जा रही है. आखि़रकार, लद्दाख में चीन के सरगर्मी बढ़ाने की एक वजह यह भी है कि ये उपाय चीन की लंबे समय से कायम बढ़त को भारत के सामरिक के दबदबे में बदल सकते हैं. कुल मिलाकर भारत अपनी सरहदों पर ढीली-ढाली व्यवस्था को मज़बूत करने के बारे में अपनी मंशा साफ कर रहा है और यह उन लोगों को असहज करेगी जो यथास्थिति के साथ सहज थे. अतीत की जड़ताओं को दूर करना न केवल ज़रूरी है, बल्कि एक न टाली जा सकने वाली ज़रूरत है.

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